Thursday, June 29, 2017

यादें

यादें 

न जाने जोड़ना अच्छा है या घटना
यादों में सिर्फ जोड़ा जा सकता है घटाया नहीं
लेकिन यादों का स्वाद क्या बदला जा सकता है ? नहीं न !!!!!!!!!
चाहती हूँ यादों  को जोड़ती जाऊँ
कुछ लोरियाँ , मीठी रोटियां , बातों की चाशनी
ऐसे मर्तबानो में भर दूँ की
जब भी खोलूँ  एकदम ताजा रहे;
तुम भी दो न मेरे हाँथ में
एक मीठी झप्पी ,  एक भीना स्पर्श
कुछ ताजे फूल जैसे डेल थे मेरे गले में कभी 
आओ न ,  हमारा साथ एक जिल्द में नत्थी कर दूँ
उस  मे कुछ सलमे सितारे सजा दूँ
की जब जब खोले हम साथ साथ मिलें
बरसो बाद , सदियों बाद
तुम्हे पता है ! तुम्हारी चुप्पी का स्वाद कैसा है???
कसैला , कड़वा , अनचाहा
फिर भी , ज्यादा  मीठे के साथ थोड़ा कड़वा भाता है
लेकिन ज्यादा ; हजम नहीं होता !!!!!



No comments:

Post a Comment

खरीद -फ़रोख़्त (#Human trafficking)

बिकना मुश्किल नहीं न ही बेचना, मुश्किल है गायब हो जाना, लुभावने वादों और पैसों की खनक खींच लेती है इंसान को बाज़ार में, गांवो...