Tuesday, July 18, 2017

मेरे देश की हवाओं से कतरा कतरा खून रिसता है

मेरे देश की हवाओं से कतरा कतरा खून रिसता  है,
परिंदों की उड़ान ज़ख़्मी हो गयी है,
हर साज़ से  सिर्फ आंशुओं की आवाज़ निकलती  है।

हर माँ दिन रात बेटों  की सलामती की दुवायें मागती है,
और हर बच्चा अब्बू के लौटने की राह देखता है।

उस अपने से देश में भी कुछ ऐसा ही नज़ारा है,
सुख चैन , नीद खुशी सब चिता की आग पर जल गए है.

अरे शांति के रखवालों ! ज़रा आवाज़ निकालो,
दोनों देशों की राजनीति में भूकंप लाओ,
ज़मीदोज़ कर दो युद्ध की मंशाओं और तैयारियों को ;
कि सरहदों पर सेना की जरूरत न हो,
और विश्व भर के रक्षा हथियारों को समुद्र में फेक दिया जाय.

जब युद्ध के साधन ही न होंगे ,
तो कैसा युद्ध ? कैसी अशांति
जब लड़ने का दिल करेगा
तो एकदूसरे को गरियायेंगे
थोड़ी ही देर में फिर गले मिल जायेंगे।



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