Saturday, July 1, 2017

एक दहशत गर्द का आत्मकथ्य


कल जब तुम आओगे इस धरती पर मेरे बच्चे,
तुम्हारा पिता ख़त्म हो चुका होगा मानवबम के शरीर में,
इंसानियत तोड़ चुकी होगी दम ,
लहुलुहान हो चूका होगा तुम्हारा आस पास
जिस अस्पताल में जन्म देने वाली है तुम्हारी माँ;
उसे उड़ाने की शाजिश कर चूका है तुम्हारा बाप ,
मै शर्मिंदा हूँ मेरे बच्चे !
तुम्हारा स्वागत  प्यार से नहीं हिंसा से होने वाला है :
लेकिन तुम अगरबच जाना मेरे लाल !
प्यार की जड़ें फैलाना हिंसा की नहीं ,
इस धरती को इंसानों की जरुरत है

हैवानों की नहीं. 

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