Friday, July 21, 2017

अरे मियां! खुश रहना है तो जुगाड़ भिड़ाओ

बड़ेअच्छे आदमी हो!
दूसरों की ही सुनते हो, </रे>
रे
अपनी क्योँ नहीं कहते हो?
रे
सिर पर अच्छाइयों का भार लाद कर क्या कर लोगे ?
हमेशा भीतर भीतर ही मरोगे .
कौन अवार्ड देने आ रहा है?
अच्छे हो या बुरे किसी के बाप का क्या जा रहा है.

तुम्हारे ही बीबी बच्चे होंगे परेशान
तुम सोचते हो उनको खुश रखना नहीं है आसान.
सोच तुम्हारी भी ठीक ही है ;
घर में कितना भी रख दो कम ही होता है
बच्चों का मन कब भरता है .

अभी तो जवान हो
सोचते हो अपना भी मकान हो,
मकान-मालिक रोज किच-किच करता है
जब बाथरूम में घुसते हो
तभी पानी बंद करता है .

इमानदारी का अब ज़माना नहीं है ,
दो- चार पैसों से कुछ होना नहीं है .
अपने आप को आइना कब तक दिखाओगे?
बच्चों को भूखे पेट कब तक सुलाओगे?
पत्नी हर रोज खाली डिब्बे ठनठनायेगी,
अंततोगत्वा तुम्हारा ही सिर खायेगी .

अरे अपने देश के नेताओं से कुछ तो सीखो ,
दस बारह फ्लैट न सही एक मकान ही बना लो.

अरे मियां! खुश रहना है तो जुगाड़ भिड़ाओ
किसी पार्टी के कार्यकर्त्ता बन जाओ,
नेता जी के पीछे-पीछे पूंछ हिलाओ.
घर तो घर गाड़ी भी मिलेगी ,
सोसाइटी में इज्जत और बढ़ेगी ,
पत्नी को भी आगे की कुर्सी मिलेगी .
सरकारी फीस पर जब चाहो विदेश घुमाओ
बच्चों को इम्पोर्टेड चाकलेट खिलाओ.

ऊपर से सफ़ेद अन्दर से काले हो जाओ
बगुला होकर हंस की चाल दिखाओ.





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