Wednesday, August 16, 2017

Love in barriers (मोहब्बत में दीवारें )


आओ खेलें छुपन-छुपाई,
तुम मुझे खोजो और मै तुम्हे,
पर्दे के इस पार, पर्दे के उस पार
दीवारों के इस पार, दीवारों के उस पार.
देखो चुपके से मेरी थाली मत टटोलना,
रात की एक रोटी रखी है उसमें,
तुम्हारे हांथो का सोन्धापन भी.
और मैने सन्भाल रखी है तुम्हारी वह प्यारी चितवन;
जब चुपके से झांक रही थी तुम रसोई के झरोखे से,
मेरी रगो में तुम्हारी हंसी की खनक अब भी मौज़ूद है.
तुम बताओ मुझे कंहा छुपाया है तुमने?
हूं भी मै तुम्हारे आस या बिसरा दिया मुझे?

हां मेरी अल्हड़ मुस्कान में तुम्हारा ही स्मित है,
मेरी नज़रों में तुम्हारी ही रोशनी,
मेरी सुबह भी तुम हो, शाम भी तुम हो
मेरे मखमली चांद भी तुम हो.
मैने तुम्हे खोज लिया है
तुमने मुझे खोज लिया है;
फ़िर ये पर्दे ये दीवारें कैसी?
अरे पगली!
दीवारें देश की, धर्म की, जाति की,
रीति की, रिवाज की अंध समाज की
क्योंकि प्रेम से परंपरा ऊपर है
व्यक्ति से ऊपर है समाज,
मै तुममे हूं या तुम मुझमे
किसी को क्या फर्क पड़ता है?


2 comments:

  1. बहुत ठीक और दमदार है।

    ReplyDelete

अटल जी की अवधी बोली में लिखी कविता

मनाली मत जइयो मनाली मत जइयो, गोरी  राजा के राज में जइयो तो जइयो,  उड़िके मत जइयो,  अधर में लटकीहौ,  वायुदूत के जहाज़ मे...