Saturday, September 2, 2017

ज्यादा सुरक्षित हैं ये जंगल

(चित्र साभार शिवानंद रथ फेसबुक वाल )

हर रोज गुजरती हूँ इस राह
कभी डर नहीं लगा.
फिर भी कहते हैं लोग
संभल कर जाना,
न जाने कब धमक पड़े बनबिलाव सरे आम,
भूख मिटाने के लिए तोड़ने लगे तुम्हारा जिस्म।
हाथ में पिसी मिर्च जरूर रखना,
दिखे कोई जंगली जानवर!
भागना मत, सीधे आँखों में झोंक देना।
सोचती हूँ, न जाने क्योँ
इन हरे जंगलों में आने से डरते हैं लोग?
यंहा तो सब कुछ साफ़ है
हवा भी, पानी भी
भूख भी और नियत भी.
यंहा चुपके से कोई हाँथ नहीं रेंगता पीठ पर.
न ही कोई गंदी नज़र कपड़ों के तले भी,
उघाड़ कर रख देती है सरे राह.
लोग प्यार से मिलते जरूर हैं
पर सीटियां नहीं बजाते।
ज्यादा सुरक्षित पाती हूँ खुद को इन जंगलों में
लोग मस्त हैं अपनी फाकाकशी में,
किसी को लूटने नहीं जाते।
औरते ज़्यादा हैं महफूज इनके घरों में
उन पर मर्यादा के पहरे नहीं लगते।






5 comments:

  1. शुभ संध्या अपर्णा बहन
    एक अच्छी कविता
    साधुवाद

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    1. यशोदा दी,प्रतिक्रिया देने के लिये धन्यवाद. सादर

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  2. बहुत सुंदर रचना आपकी अपर्णा जी।

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    1. शुक्रिया स्वेता जी.

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  3. जंगल न होगा तो जीवन कहा रहेगा ...
    बहुत जरूरी है पेड़ों का होना जंगल का होना इंसान के लिए ...

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