Monday, November 6, 2017

रंगमंच पर टंगे चेहरे (लघुकथा )



1.
रौशनी से नहाये हुए मंच पर परियां खिलखिलाती हैं, झूमती हैं, मस्तानी अदाएं दिखाती है.
सीटी बजाते हैं लड़के, पीछा करते है, छेड़ते हैं, आहें भरते हैं
रंगीन गुब्बारों को हवा में उड़ाकर;
प्रेम का इज़हार करते हैं.
२.
हाँथ में कटोरा लिए वृद्ध कांपता है, ठिठुरता है, पेट पकड़कर बैठ जाता है कूड़ेदान के सहारे. तभी बड़ी सी कार से एक जोड़ा निकलता है हांथों में हाँथ डाले और ......स्नैक्स का खाली पैकेट वृद्ध के चहरे पर फेंकता हुआ निकल जाता है अपनी दुनिया में......
3.
दुधमुहे बच्चे को पेड़ के नीचे लिटाकर होंठो पर लिपस्टिक पोतती है वैश्या,
सड़क के किनारे खड़े होकर अश्लील इशारे करती है, पटाती है ग्राहक,
खरीदती है दूध का पैकेट और गुम हो जाती है बस्ती की ओर जाती हुई पगडंडी पर.....
 4.
मंच पर अपने संवाद बोलते-बोलते अचानक रुक जाता है कार्तिक. इधर –उधर देखता है और फिर अपने संवाद बोलने लगता है. पर्दे के पीछे खलबली मच जाती है. अचानक मंच पर अँधेरा हो जाता है और कार्तिक के चेहरे पर सीधे रोशनी पड़ती है. दर्शक अब सिर्फ कार्तिक का चेहरा देखते हैं, कुछ बुझा सा,कुछ उदास. कार्तिक अपने वस्त्र खोल देता है, रोशनी उसके पूरे शरीर पर पड़ रही है. बड़े बड़े फफोले, कंही कंही से खून रिसता हुआ. कार्तिक तड़पता है, तेज चीत्कार के साथ गिर पड़ता है और उसके मुंह से झाग निकले लगती है . दर्शकों के बीच पिन ड्राप साइलेंस. पर्दे के पीछे से लोग दौड़ कर आते हैं. अरे! इसे आज ही जहर खाना था और ठीक मंच पर आने के पहले?
कंही से आवाज आती है, एम्बुलेंस! एम्बुलेंस
दर्शक खड़े हो जाते है. और आप................

(image credit google)

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