Wednesday, December 6, 2017

बाकी है अब भी!


जब- जब तुम्हे मिलने निकलती हूँ
बादलों के मेलें में गुम हो जाती हूँ
तुम, चाँद बन इठलाते हो,
खेलते हो छुपंछुपाई
हवा के झूलों पर उड़ती हूँ
दौड़ती हूँ तुम्हे छूने को 
हज़ार कोशिशें करती हूँ 
और तुम!
भागते हो मुझसे दूर
अमावस की चादर तले
छुपते हो 
निहारते हो चोरी- चोरी
मेरे एहसास में गुम हो तुम भी 
फिर; ये कैसा खेल?
बाकी है अब भी 
प्रेम का प्रकटीकरण।।।।  


(picture- google)

5 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 07-12-2017 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2810 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  2. प्रेम के पलों की चुलबुली कल्पनाओं को शब्द में बाखूबी उतारा है ...

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  3. Bahut Sunder Rachna
    Aap ki Har Rachna kamal ki Hoti Hai
    Bahut Arthpurn likhti Hai Aap

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  4. Bahut achhi shabdawali mein anuthe prem ka varnan. Mantra mugdh ho gayi padhte-padhte.

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