Friday, December 8, 2017

इंसानों के बीच एक दिन


गलियों में घूमते हुए 
बरबस ही खींचती है गरम - गरम भात की महक,
दरवाजा खुला ही रहता है हमेशा 
यहाँ बंद नहीं होते कपाट 
चोर आकर क्या ले जायेंगे.
जिस घर  चाहूं घुस जाऊं 
तुरत परोसी जायेगी थाली 
माड़ - भात, प्याज, मिर्च के साथ 
हो सकता है रख दे हाँथ पर गुड़ कोइ 
और झट से भाग जाए झोपडी के उस पार.
यंहा भूखे को प्यार परोसा जाता है
भर- भर मुट्ठी उड़ेला जाता है आशीर्वाद.
फसल काटने के बाद 
नाचते है लोग 
घूमते हैं मेला 
प्रेमी युगल आज़ादी  से चुनते हैं अपना हमसफ़र 
दीवारें नहीं होती यंहा 
मज़हब और जाति की 
जब तक घर में धान है 
हर घर है अमीर 
धान ख़तम, अमीरी ख़तम 
फिर वही फ़ाकामस्ती
वही दर्द , वही दवा 
इनकी ज़िंदगी खदबदाती है खौलते पानी में,
पानी ठंढा हुआ जीवन आसान 
पानी के तापमान के साथ 
घटता- बढ़ता है सुख-दुःख 
पानी जैसे ही बहता है जीवन 
पानी जैसा मन 
जिस बर्तन डालो 
उस जैसा तन.

(Image credit google)





7 comments:

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    1. Berojgar lekhak ji, ek baat bataiye... Lekhak humesha hi berojgar rahta hai par publisher nahin...
      Aisa kyon???

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  2. 👏👏👏👏वाह क्या बात ...अपर्णा जी ..
    बेहतरीन भाव सहज सपाट ..ना कोई छंद ना अलंकार
    पर जेहन मै खनकता स्वर संताप ..
    विलग सा लेखन ..मानो दर्द मसि मै डुबोई कलम नोक चले तो पन्ना कराह उठे ...🙏

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    1. आदरणीय इंदिरा जी, आप की प्रतिक्रिया रचना का मोल दोगुना कर देती है.
      बहुत बहुत आभार आपका. आप के स्नेह और आशीर्वाद की आकांक्षा के साथ. सादर

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  3. बहुत सुंदर अपर्णा जी,जीवन की नंगी सच्चाई बयान करने में आपकी बेजोड़ कलम कमाल करती है। आपकी रचना ने गाँव-घर की यात्रा करवा दी। वो झोपड़ी से उठता धुँआ और भात की महक फैल गयी ज़ेहन में।
    बहुत अच्छा लिखा आपने अपर्णा जी।

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    1. बहुत बहुत आभार श्वेता जी , इतनी उत्साह वर्धक प्रतिक्रिया देने के लिये.
      सादर

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  4. भावुक एहसास
    उम्दा रचना

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दूर हूँ....कि पास हूँ

मैं बार-बार मुस्कुरा उठता हूँ  तुम्हारे होंठो के बीच, बेवज़ह निकल जाता हूँ तुम्हारी आह में, जब भी उठाती हो कलम लिख जाता हूँ तुम...