Tuesday, April 24, 2018

दूर हूँ....कि पास हूँ


मैं बार-बार मुस्कुरा उठता हूँ 
तुम्हारे होंठो के बीच,
बेवज़ह निकल जाता हूँ तुम्हारी आह में,
जब भी उठाती हो कलम
लिख जाता हूँ तुम्हारे हर हर्फ़ में,
कहती हो दूर रहो मुझसे....
फ़िर क्यों आसमान में उकेरती हो मेरी तस्वीर?
संभालती हो हमारे प्रेम की राख; 
अपने ज्वेलरी बॉक्स में,
दूर तो तुम भी नहीं हो ख़ुद से
फ़िर मैं कैसे हो सकता हूँ?
तुम्हारे तलवे के बीच
वो जो काला तिल है न;
मैं वंही हूँ,
निकाल फेंको मुझे अपने वज़ूद से, 
या यूँ ही पददलित करती रहो,
उठाओगी जब भी कदम,
तुम्हारे साथ -साथ चलूंगा,
और तुम!
धोते समय अपने पैर,
मुस्कुराओगी कभी न कभी.

#अपर्णा बाजपेई

(Image credit to dretchstorm.com)




Thursday, April 19, 2018

झूठे बाज़ार में औरत


एक पूरा युग
अपने भीतर जी रही है स्त्री,
कहती है ख़ुद को नासमझ,
उगाह नहीं पायी अब तक
अपनी अस्मिता का मूल्य,
मीडिया की बनाई छवि में
घुट-घुट कर होंठ सी लेती है स्त्री,
सड़कों पर कैंडल मार्च करती भीड़ में
असली भेड़ियों को पहचान लेती है स्त्री 
चुप है,
कि उसके नाम पर 
उगाहे जा रहे हैं प्रशस्ति पत्र,
रुपयों की गठरियाँ सरकाई जा रही हैं
गोदामों में,
स्त्री विमर्श के नाम पर
झूठ के पुलिंदों का
अम्बार लग रहा है,
लोग खुश हैं!
कि रची जा रही है 
स्त्री की नई तस्वीर,
खोजती हूँ
कि इस तस्वीर से 
आम औरत ग़ायब है?

(Image credit google)


Monday, April 16, 2018

एक कवि से उम्मीद!


लिखो प्रेम कवितायेँ
कि..... प्रेम ही बचा सकेगा
तिल-तिल मरती मानवता को,
प्रेम की अंगड़ाई जब घुट रही हो सरेआम,
मौत के घाट उतार दिए जा रहे हों प्रेमी युगल,
कल्पना करो
प्रेम के राग में सड़ांध भरती सिक्कों की खनक को,
प्रेम की दीवारों पर लचक रहे हैं खून के धब्बे,
अपने आप में विलुप्त होता इंसान
भूल रहा है;
माँ की आँखों से बह रहा प्रेम,
पत्नी की सिसकियों की लय हो रही बेज़ुबान,
बरस रही हैं आसमान से 
प्रेम के विरोध में फतवों की धमक,
किताबों से मिटाया जा रहा है प्रेम का हर अक्षर,
तब उम्मीद सिर्फ तुम्ही से है दोस्त!
कि लिखो तुम प्रेम की अपूर्ण रह गयी कहानियां,
अपनी कविताओं में प्रेम पर हो रहे अत्याचार की चिन्दियाँ करो,
भरो प्रेम का राग हर कंठ में,
तुम्हारी कविताओं में जिंदा रह गया प्रेम;
बोयेगा बीज एक दिन,
धरती पर प्रेम ही खेती लहलहायेगी,
प्रेम के अवशेष 
खड़े कर ही लेंगे 
कभी न कभी मानवता की अटारियां,
प्रेम को नया जीवन दो,
लिखो प्रेम के आख्यान,
करो रंगों, फूलों, तितलियों की बातें,
विश्वास है मुझे ;
बचा सकती हैं प्रेम कवितायें ही
इस संसार को मरघट बनने से....

(श्वेता जी की कविता की प्रतिक्रिया स्वरुप लिखी गई कविता)
(Image credit Google)

Friday, April 13, 2018

डरती हूँ मैं!


जब भी, 
फ़िर से, 
काम पर जाने की इच्छा, 
उठाती है सिर,
ज़मीदोज़ कर देती हूँ उसे,
आख़िर एक नन्ही सी बच्ची की माँ जो हूँ......
घर में, 
मंदिर में, 
अस्पताल में, 
स्कूल में, 
सड़क पर,
बस में,
ट्रेन में.... 
सब जगह हो सकता है बलात्कार!
आठ महीना, 
दो साल, 
तीन साल,
पांच साल,
सात साल, 
दस साल 
किसी भी उम्र में हो सकता है बलात्कार!
क्या करूँ, कंहा रखूँ उसे 
जंहा वो रहे महफूज़ हर बुरी नज़र से...
डरती हूँ कि..... 
नन्ही सी बच्ची, 
नहीं समझती 
गलत हरकतें,
समझ नहीं पाती
गंदे इशारे,
दौड़ जाती है 
एक चॉकलेट के लालच में
हर एक की गोद में,
हर इंसान को समझती है अपना,
नहीं जानती,
इंसान की शक्ल में,
दौड़ रहे हैं भेड़िए,
कब किसे कंहा दबोच लें
कोई पता नहीं.

(Image credit google)

Thursday, April 12, 2018

विदा का नृत्य




मैं तुममें उतना ही देखता हूँ,
जितना बची हो तुम मुझमें,
किंवाड़ से लगकर भीतर झांकती तुम्हारी आँखें,
निकाल ले जाती हैं मुझे
पूरा का पूरा,
जीवन भर,
पुआल के ढेर पर सोता मैं,
सुस्ताता हूँ थोड़ी देर,
डनलप के गद्दों पर,
नींद आजकल सो रही है 
खेत के मेढ़ सी,
न इधर न उधर,
तराशता हूँ जब भी तुम्हारा बुत,
ख़्वाब में भी फूट जाते हैं,
तुम्हारी देह पर पड़े फ़फोले,
अपनी बुतपरस्ती देख,
रेशा-रेशा दहकता हूँ मैं,
भागता हूँ ख़ुद से दूर,
खो जाता हूँ किसी लोक धुन में,
नाचता हूँ सुखाड़ के गीतों पर भी,
अपने पैरों के जख़्मी होने तक,
अनंत यात्रा पर निकलता हूँ,
छोड़ जाता हूँ ये खलिहान,
कि...फसलें उगाने के दिन बीत गए हैं।
(Image credit google)

Saturday, April 7, 2018

समय की उड़ान


ढिबरी की रौशनी में पढ़ती हुई लड़की
भरती है हौंसलों की उड़ान,
अंतरिक्ष का चक्कर लगाती है
चाँद तारों को समेट लाती है अपनी मुट्ठी में,
जब जब आंसुओं के मोती देखती है
माँ की आँखों में,
खिलखिलाकर एक सूरज उगाती है
उसके होंठों पर,
माँ की बिवाइयों पर लगाती है
अपनी परवाज़ का लेप,
पिता की टोपी पर
जड़वाती है अपनी क़ाबिलियत के हीरे,
एक दिन ढिबरी की रौशनी में
पढ़ती हुयी लड़की;
लाती है बदलाव की बयार
रौंद देती है ज़ुल्मो सितम की कहानियां.....
फ़िर कोख से कब्र तक
उसके होने पर जलाये जाते हैं खुशियों के चिराग
उल्लास के गीतों में होता है उसका स्वागत
ढिबरी की रौशनी में पढ़ती हुयी लड़की
बन जाती है समय की उड़ान......
हमारे घरों में मुस्कुराती है,
खुशियों के गहने
सबके होठों पर सजाती है।

(Image credit google)



Friday, April 6, 2018

पूर्ण विराम कंहा है!


एक नृशंस कालखंड दर्ज हो रहा है इतिहास में
            भीड़ की तानाशाही और रक्तिम व्यवहार
ताकत का अमानवीय प्रदर्शन
क़ानून की धज्जियाँ उड़ाता शाशन-प्रशासन....

हिंसा हथियार है और अविवेक मार्गदर्शक
खौफ़नाक मंसूबे उड़ान भर रहे हैं
ये हम किस युग में जी रहे हैं!
किसका ज़्यादा खून बहा
किसकी ज्यादा हुयी हार,
कौन बैठा है कुर्सी पर
कौन छील रहा घास,

बर्बर है सोच....
मौत का बदला मौत!

क्या मौत के बाद भी मरता है वक़्त?
चुकती हैं रक्त पिपासु आदतें?
पूर्ण विराम खोज रही हूँ
जाने कंहा चला गया....

(Image credit google)

Thursday, March 29, 2018

अंत हुआ तो ख़ाली दामन


फूल यूं मुस्कुराये कि गिर गए
शाख़ को गमज़दा छोड़कर, 
तितलियां आजकलनहीं आती
झर रहीं पत्तियां बेसबब यूं ही।

रात तूफ़ां ने यूं क़यामत की
झुग्गियां उजड़ी, मर गयी साँसे,
गिर गए ईमान संग दरख़्त कितने
कब्र खोदी और छुप गयीं खुशियां।

धूप की चिन्दियाँ यूं बिखरी हैं
जैसे सोना बिछा हो धरती पर,
मुट्ठियाँ बांधता मुसाफ़िर जब
धूप साये सी हाँथ नहीं आती ।

वजन में दो गुनी हुईं बातें
काफ़िले हाकिमों के घेरे हैं,
गिनती निवालों की हो रही है यहाँ
जिनसे उम्मीद वो मुंह को फेरे हैं।

कोठियां भर गयी हैं नोटों से
दिल है सूना के नींद नहीं आती,
उम्र भर लूटता रहा दौलत
आज लगता के हाँथ खाली है।

(Image credit google)




Tuesday, March 27, 2018

धार्मिक तन्हाई का दंश

धर्म का लाउडस्पीकर
जब उड़ेलता है उन्माद का गंदा नशा
हाँथ पैर हो जाते हैं अंधे,
नौजवान खून उबाल मारता है,
मासूम हाँथ रंग जाते हैं अपनों के खून से,
ज़ालिम दिमाग़ कोनों में मुस्कुराते हैं,
राजनीति की रोटियां सिंकती हैं
बेगुनाहों की चिता पर,
कानून के हांथ आये नादान लोग
जेल की तन्हाई में काटते हैं जवानी,
पैदा होती है अपराधियों की एक और पौध,
कुछ और शातिर दिमाग
सीखते हैं मक्कारी,
चल पड़ते हैं उसी राह पर
कि दूर कर दो बच्चे को बच्चे से,
फ़िर कभी धर्म के नाम पर खुशियां न मन सकें.
(Image credit google)





Monday, March 26, 2018

तेरी सुरमयी याद में गुलाबी हम


 प्रेम के पैरहन में
खूबसूरत लड़ियाँ पड़ीं है
हमारे स्पर्श की, 
नैनों ने कहा कुछ....
कि अफ़सानों ने चलना शुरू किया,
रात की उतरन ने गुलाबी सूरज थमाया
हरी चूड़ियों ने बोये कुछ कचनार 
रजनी गंधा की कलियां चहकीं 
घुल गयीं साँसों के संग
मैं.. बेतरतीब सी .... 
आँचल संभाले दौड़ती हूँ ;
वक्त को गोद में उठाने 
और तुम......
हवाओं का पीछा करते हो.
भीना भीना है सब कुछ,
उम्मीदों के बाग़ बहार की प्रतीक्षा में हैं
कपाटों की झिरी से
झांकती है मनुहार
सुरमयी आँखों ने 
रुपहले ख़ाब बुने हैं ... कि 
तुम्हारी कश्ती इस बार 
मेरी ही जमीन में लगेगी
और हम 
नदियों से सागर होने की यात्रा करेंगे...


Saturday, March 10, 2018

कल वाले लेमनचूस!


थोड़ा पागलपन भेजवादो
और ज़रा से लेमनचूस,
जीवन इतना खट्टा हो गया
दिल के इन गड्ढों से पूछ। 

भोर का सूरज जगा नहीं है 
चंदा निदिया को तरसे,
फूल गंध से बिछड़ गए हैं
बादल पूछें क्यों बरसें।

कोई आकार कह दो इनसे 
दो पल का ही जीवन है 
कह लो सुन लो एकदूजे से, 
सारी उम्र न जाए बीत। 

बीत गयी जो बात गयी 
कुछ मुस्कानें सजवा दो, 
पतझड़ जैसी शामों में 
नूतन कलियां खिलवा दो। 

बचपन वाली सीखें कहती 
कहा सूनी पर मिट्टी डाल,
प्यार की झप्पी ले दे करके
सबके मन का जाने हाल।

बाहर का तो बहुत हो गया
अंतर चेहरा दिखला दो,
हर मन में इक दर्पण है
उस को उजला करवा लो।

Thursday, March 8, 2018

शून्य हैं हम

हर गिरता हुआ पत्त्ता
करता है शाख़ से बेपनाह मोहब्बत, 
होता है उदास अपने विलग होने से,
शाख़ भी मनाती है शोक;
रोती है, उदास होती है,
देखती है जमीं पर उन्हें मरते हुए.....
एक दिन समझ लेती है वो भी 
धोखा नहीं.... समय का दस्तूर है
कि छूट ही जाते हैं अपने 
कभी न कभी....
उम्र और ज़िंदगी
मेहरबान नहीं रहती हमेशा, 
समय करता है सवाल
जवाब भी खुद लिखता है.....
हम तो बस
शून्य हैं....
समय की दहाइयों के मोहताज
शाख़ से गिरे पत्तों की मानिंद
कभी ऊपर....
कभी नीचे ....

(चित्र साभार google)





Tuesday, March 6, 2018

प्रणय रंग की बतियाँ



मेरे अधरों पर जब उनके गीत निखरते हैं,
मैं उनमे वो मुझमें कुछ ऐसे बसते हैं, 
वासंती मदमस्त हिलोरें उठती नैनों में, 
मेरे हिय में उनकी साँसे जीवन रचती हैं.


रंग रंग के फूल खिले हैं रंगीला है मौसम, 
धरती अम्बर डोल रहे हैं बदरी नाचे छम-छम, 
कोयल कूके बागन में और बंसी नदिया नारे, 
 प्रियतम के रंग ने रंग डारे रतिया, चंदा, तारे.


कानों में हर आहट कहती वो संदेशा आया, 
मन में मेरे मधुरस घोले ऐसा नेह है लाया, 
हुए बावरे नैन रंगीले अपनी सुध-बुध खोये, 
घूंघट के पट खोल नजरिया अंखियाँ खोले सोये. 


ऐसी प्रीत का घूँट पिया है मीरा बन कर डोली 
पिय के रंग में रंगी दुल्हनिया लाज-शर्म सब भूली 
प्रणय रंगों में खोकर, छुपकर प्रियतम को रंग आयी 
खुद को खोकर उसको पाया ऐसी रीत बनायी। 

(चित्र साभार google)








Monday, March 5, 2018

वे गायब हैं!


एक सच यह है 
कि...... बलात्कृत स्त्री साँसे नहीं लेती, 
हवाओं में चेहरा नहीं उठाती,
नज़रें नहीं मिलाती खुद से 
समझती है खुद को मृत 
जबकि;
बलात्कार सिर्फ स्त्री का नहीं होता..... 
बलात्कार होता है सामाजिक मूल्यों का,
परवरिश की नींव खोखली हो जाती है,
हर पुरुष के चेहरे पर उग आते हैं
प्रश्नचिन्हों के कैक्टस!!!! 
झुकी हुयी नज़रें उठ नहीं पाती,
विश्वास काली पट्टियाँ बाँध 
निकालता है जुलूस 
और स्त्रियां.....
अपने शरीरों से गायब हो जाती हैं ....

(image credit shutterstock)

Thursday, March 1, 2018

मुझे लिखा जाना बाकी है अभी!


मैं एक ख़त हूँ;
मुझे लिखा जाना बाकी है अभी,
गुलाबी सफहों के ज़िस्म में ढलकर
सुर्ख स्याही के मोतियों से सजकर
मेरा पैग़ाम बन इठलाना बाकी है अभी,

हयात चार दिनी और बची है मुझमें
उसके हांथों में लरजता हुआ टुकड़ा हूँ मै, 
जाने कब दिल का हाल सुनाएगी मुझे 
अपने अजीज़ का हाल बताएगी मुझे 

जानता हूँ जब भी लिखेगी मुझको वो
शर्म से खुद में ही बार-बार सिमट जायेगी 
हर एक हर्फ़ के बाद खुद से पूछेगी 
कोरे कागज़ को एहसास बताना गुस्ताख़ी तो नहीं? 

न मुझमे जान है,न साँसे हैं कि कह सकूं उससे 
मुझ पर एतबार करे और दिले ग़ुबार लिखे,
रखूंगा राज़ हर शै से बचाकर तब तक
उसकी स्याही के रंग नहीं बुझते मुझमें
मै एक ख़त हूँ इंसां नहीं के मुकरूंगा
बस एक बार वो मुझ पर ज़रा ऐतबार करे।।

(image credit google)

Wednesday, February 28, 2018

पगडंडियाँ उदास हैं!

कंटीली झाड़ियाँ उग आयी हैं 
रिश्तों पर,
मौन है हवा... 
घूंघट वाली ठिठोलियाँ गायब हैं
बंसी की उदास धुन 
और प्रेम की आवारगी;
खो गयी हैं शहरी बाजारों में, 
पायलों की रुनझुन ने  
बदल लिया रास्ता,
हाँथ से हाँथ का स्पर्श
बिछड़ गया .......
मंदिर की घंटियां सुन 
देहरी पर दिए नहीं जलते,
पगडंडियाँ उदास हैं!
कि.... उन पर लौटने वालों के 
पदचिन्ह नहीं दिखते.

(Image credit google)
 

Thursday, February 15, 2018

खलल (तीन कवितायेँ)


१. 
ज़िंदगी से जूझ कर
मौत से युद्ध कर 
ऐ दुनिया! 
इंसान को इंसान से मिला,
खलल पैदा कर 
इस अनवरत चक्र में,
वक्त के पाटों में पिसती इंसानियत 
तड़पती है, 
रोती है ज़ार-ज़ार,
देखती हूँ आजकल....... 
आदमी से आदमी गायब है.

२.
देहरी के भीतर कदम रख 
खलल पैदा किया एक स्त्री ने;
एक स्त्री के साम्राज्य में,
वक्त की सुई घूमती है,
रिश्तों के बंध बनते हैं,
टूटते हैं कुछ पुराने रिवाज़,
बदल जाती है 
एक स्त्री की कुर्सी..... कि 
समय नए का स्वागत कर रहा है.

3.
आवारागर्दी करती हवा 
बार बार खलल डालती है 
तरतीब से बंधे गेसुओं में,
आवारा बादल ले आते है बरसात 
खलल पैदा करते हैं 
धूप और धारती के मिलन में,
जब जब खलल पड़ता है 
पाताल की चट्टानों की सेज में 
कांपती है धरा
जमींदोज हो जाती हैं 
बसी बसाई जिंदगियां,
बहुत कठिन होता वक्त को थामना, 
आखिर शब्द भी 
खलल डाल ही देते हैं 
रिश्तों में,
गर समझ कर न बुना जाय
बातों का ताना- बाना. 

Tuesday, February 13, 2018

प्रेम की तारीख



आँखों की कोरों में एक सागर अटका था 
दहलीज पर टिकी थी लज्जा
आँचल खामोश था 
थामे था सब्र ..... कि
खुद से मिलने की घड़ी बीत न जाय.

मौसम में थी बेपनाह मोहब्बत
लबों पर जज्बातों की लाली 
अलकों में अटका था गुलाबों का स्पर्श 
नाचती धरती ने एक ठुमका लगाया
वसंत ने ली अंगडाई 
और प्रेम 
तारीखों में अमर हो गया.

(Image credit Google)

Saturday, February 10, 2018

शेयरिंग इज केयरिंग


पार्क की बेंच पर बैठकर 
बातें करते हो मुझसे,
अपने स्कूल की कहानियाँ सुनाते हो,
मै मुस्कुराता हूँ तुम्हारी खुशी पर,
ललचाता हूँ
तुम्हारे स्कूल की 
कहानियों में 
शामिल होने के लिए,
तुम्हारी चमकती पोशाक 
मेरी नीदें चुरा लेती है 
तुम्हारी भाषा 
मुझे कमतरी का एहसास कराती है,
मै दौड़ता हूँ तुम्हारे साथ हर दौड़ 
पर 
जीतते तुम्ही हो,

जब अपने पुराने कपड़े देकर 
सीखते हो तुम
शेयरिंग इज केयरिंग,
तब मेरे हिस्से के फल 
भरे होते हैं तुम्हारे रेफिजरेटर में,
मेरे हिस्से की किताबें 
पड़ी होती हैं तुम्हारे घर के कबाड़ में,
जब तुम जाते हो स्कूल
मेरे घर की रौशनी
चमकाती है तुम्हारा भविष्य

तुम्हारी स्कूल बस 
धुआं भले ही छोड़ती है मेरे ऊपर 
फिर भी
दूर तक भागता हूँ मै
उसके पीछे,
रोज रोज तुम्हारे पीछे भागने के बावजूद
कभी नहीं पंहुच पाता
उस चमकती हुयी दहलीज के भीतर 
जंहा मेरे हिस्से की सीट पर 
कोई और काबिज है.

(Image credit shutterstock)







Friday, February 9, 2018

प्रेम दिवस के नाम


तुम प्रणय का पुष्प बनाकर
बस गए मेरे निलय में,
मै निशा की श्वेत चादर
बंध गयी तेरी गिरह में.

प्रीत की अठखेलियाँ
मचलीं तुम्हारे गेह में
सिंच गयीं कलियाँ तृषा की 
मधु भरे पावन नयन में।

है सुबह कुछ खास
मंजर भी नवेले वस्त्र में
प्रेमियों की रौनकें
बिखरीं धरा के वृत्त में

इश्क की अनुपम फिजां
आज कुछ आज़ाद है
उड़ चले परवाज़ देखो
डर खुशी के बाद है.

मौत से पहले सजा लें
मांग अपने स्वप्न से
नेह की दुनिया सजा दें 
चिर विरह के अंत से.

(चित्र साभार गूगल)



Sunday, February 4, 2018

प्रेम की उतरन


अंजुरी में तुम्हारी यादों का दिया जला
पढ़ता रहा हमारी अनलिखी किताब.
हमारा साथ अंकित था हर पृष्ठ पर,
हमारा झगड़ा और वो
अनोखी सुलह.....
जब तुमने हमारे रिश्ते के लिए
बाज़ार की शर्त लगा दी.......
और मै!
कांपता ही रहा अनोखे डर से.
मेरी हंथेली में तुम्हारी रेखा नहीं थी
और तुम ....
नसीब पर ऐतबार कर रही थी.
चाहा था मैंने भी उतना ही
जितना तुमने;
साथ हमारा खिले
सुर्ख गुलाब सा।
सूखे गुलाबों की पंखुड़ियां
महकती हैं अब भी,
उड़ते हैं मोरपंख,
गौरैया का घर टंगा है अब भी वंही,
स्वप्नों की कतरने
सजी हैं दीवारों पर,
तुम भी हो,
मै भी हूँ,
बस हमारा रिश्ता
बाज़ार में बिक गया ।

(Picture credit google )




Thursday, February 1, 2018

ख़त


उजड़े हुए खतों ने आज फिर दस्तक दी, 
चाँद शरमाया, 
सिमटा, 
लरज गया मात्र सरगोशी से 
उफ़ान पर थे बादल, 
बरसने को बेताब। 
हवा ने थामा हाँथ, 
ले गयी दूर..... 
कहा!  
यादों के सिरे थाम कर; 
बहकाना गुनाह है. 
खतों का क्या, 
बिन पता होते हुए भी 
पंहुच ही जाते हैं, 
प्यार पंहुचा ही देते है प्रिय के पास, 
जान शब्दों में नहीं,
एहसासों में होती है,
और ख़त........  
एहसासों का शरीर। 

(picture credit google)


Wednesday, January 31, 2018

इंद्रधनुष




इंद्रधनुष आसमान में ही नहीं उगता
यह उगता है एक स्त्री के जीवन में भी 
हर शाम खून के लाल-लाल आंसू  टपक पड़ते है 
उसकी आँखों से; 
जब खरीदकर अनचाहे ही
 बिठा दी जाती कोठे पर बार बार
 बिकने के लिए.

इंद्रधनुष का नीला रंग 
जब-तब कौंध जाता है 
जब प्रकट करती है वह अपनी इच्छा 
और बदले में मिलते हैं क्रोध के उपहार,

कहते हैं बैगनी रंग औरतों की आज़ादी का प्रतीक है 
देखिये कभी उसकी आँखों के नीचे उभरे हुए स्याह दाग 
आज़ादी के मायने उसकी हर तड़प में सिमटे हुए मिलते हैं,

इन्द्रधनुष का हरा रंग 
उसकी कोख में तोड़ता है दम,
सूख जाती है हरियाली,
पता चलते ही भ्रूण मादा है नर नहीं 
और......... बहा दिया जाता है बेवजह रक्त के साथ

हर ताने के बाद बुझ जाता है उसके जीवन से 
उल्लास का नारंगी रंग,
समाज मीच लेता हैं आँख और औरत; 
व्योम के आसमानी रंग सी 
विस्तार पा जाती है अपनी कुर्बानियों में.

बारिश के बाद
आसमान में उगता है इन्द्रधनुष 
और......... 
ज़िंदगी से मिट जाते हैं इन्द्रधनुष के रंग 
कि...... औरत को औरत होने की सज़ा मिलती है.

(image credit google)


Tuesday, January 30, 2018

पंखुड़ियां (एक अद्भुत कहानी संग्रह)

आपको यह ख़ुशख़बरी देते हुए असीम हर्ष हो रहा है कि प्राची डिजिटल पब्लिकेशन की ओर से देशभर के 24 लेखक एवं 24 कहानियां का आयोजन किया गया जिसे "पंखुड़ियाँ" नामक कहानी संग्रह के रूप में 24 जनवरी 2018 को ई-बुक के रूप में पाठकों के लिए ऑनलाइन देश और दुनियाभर के ई बुक स्टोर्स पर उपलब्ध कराया गया  है। 
प्राची डिजिटल पब्लिकेशन का हार्दिक आभार मेरी कहानी को शामिल करने के लिए । 
अधिक जानकारी के लिए नीचे दिया  गया लिंक क्लिक करें -

http://www.indibooks.in/p/pankhuriya-ebook.htmlhttp://www.indibooks.in/p/pankhuriya-ebook.html

Monday, January 29, 2018

अच्छे बच्चे


अच्छे बच्चे रोते नहीं 
न ही करते हैं जिद 
भूख लगने पर माँगते नहीं खाना 
ललचाई हुयी नज़रों से देखते नहीं भरी हुयी थाली। 
अच्छे बच्चे कहना मानते हैं माँ-बाप का 
फटे कम्बल में सो जाते हैं
 ठिठुरते हुए पैर मोड़ कर.....  
पार्टियों की पत्तलों से खोज लेते हैं अपना हिस्सा 
छोटे भाई बहनों को खिलाते हैं पहले। 
अच्छे बच्चे स्कूल नहीं जाते 
भोर अँधेरे काम पर जाते हैं 
कमाकर भरते हैं पेट परिवार का 
खेलने की उम्र में सीख जाते हैं दुनियादारी। 
अच्छे बच्चे बचपन में ही ओढ़ लेते हैं बुढ़ापा 
खिलखिलाते नहीं, रोते नहीं, उड़ते नहीं 
अच्छे बच्चे जन्म से ही बड़े हो जाते हैं 
बन जाते हैं आदमी 
अच्छे या बुरे 
दुनिया जानती है!

(Picture credit google)

Sunday, January 28, 2018

होना- न होना



उम्र भर तेरे इश्क की बाती जलाए 
जोहता हूँ बाट
आहट की,
रुनझुन का राग कब से गायब है 
पर्दे के उस पार तुम्हारी उँगलियों का स्पर्श ताज़ा है अब भी 
तुम लापता हो अपनी तस्वीर से 
ये जो माला टंगीहै न 
कहती है तुम्हारी अनुपस्थिति की कथा 
पर कमबख्त कान.......  सुनते ही नहीं
बस एक बार आकर कह दो 
कि तुम नहीं हो आस-पास 
मान लूंगा मै.
बस इतनी सी गुज़ारिश है 
झटक दो मेरा हाँथ अपनी स्मृतियों से...... 
समेट लो अपनी ध्वनि तरंगे इस कोलाहल से 
जो मेरे अन्दर बेचैन है
तुम्हारा होना ही जिंदा है 
न होना;
जाने कब का मर गया!

(image credit google) 

Friday, January 26, 2018

समय उनका है!


वे हमारा सूरज अपनी जेबों में ठूंस लेते हैं 
हम रात की तारीक घाटियों में ज़िंदगी तलाशते हैं,
वे चमन की सारी खुशबुओं को अपने हम्माम में बंद कर लेते हैं 
और हम.... 
सड़ांध में मुस्काने खोजते हैं,
एक दिन जब भर जाएगा उनका पेट..... 
वे उल्टियां करेंगे शानो-शौकत की 
और हम उनकी उतरन
अपनी तिजोरियों में बंद कर लेंगे,
बाकी नहीं हैं दिन 
और......... रातें भी ख़त्म!
सुई की टिक-टिक उनके इशारों पर नाचती है,
हम...... अपने समय  का इंतज़ार कर रहे हैं!!!!!!
प्रक्षेपण न जाने कब हो जाए,
बंद हो जाए रौशनी
दर्शक दीर्घा में पसर जाए सन्नाटा
आओ एक आवाज़ तलाशें
मरघट में शायद चीत्कार के अर्थ बदल जाएँ।

(Image credit google)

Friday, January 12, 2018

मुक्ति!


प्रेम की कश्ती समन्दर ले चला है
और ममता खोजती है छाँव अपनी
अश्क सारे बन रहे अवलंब अपने
दास्तां किसको सुनाये मोह बंधन.

है अगर ये प्रीति सच्ची देह की
तो तुम्हे हम रोक लेंगे मार्ग में ही
हाथ थामे रूह से चलकर मिलेंगे
और उसको सौंप देंगे प्रीति अपनी.

लो संभालो नेह के बंधन रसीले
हम हुए अब मुक्त इस स्थूल जग से
ले चलो गन्तव्य तक अब साथ दो तुम
थक गया हूँ मैं बहुत अब थम लो तुम.

जग है मिथ्या, तन है मिथ्या और मिथ्या रीतियाँ सब
सिर्फ सच्ची रूह है और उसकी खूबियाँ सब
एक डगर जाती वंहा है सब है राही उस डगर के
एक मंजिल , एक मकसद, एक ही रब है सभी के 
छोड़ दो ये आपाधापी , उसकी डोरी थम लो अब 
तोड़ कर सब अर्थ बंधन मुक्त हो कर सांस लो अब.  

(image credit google)




Thursday, January 11, 2018

चाय वाली सुबह! #Tea



तुम्हारी आवाज़ में उगता है मेरा सूरज 

चाय बनाते हुए जब गुनगुनाती हो भोर का गीत
रात के कांटो से फूलों के गलीचों पर उतर आता हूं,
उस फ़ानूसी कप में जब थमाती हो मुझे गर्मागर्म चाय..
मै.... जैसे लौट आता हूं भटकती राहों से,
रात का सपना हो या दिवास्वप्न
मशीनों के साथ जूझते वक्त में
तुम्हारी चाय!
मुझे ज़िंदगी सौंपती है,
जुबां पर इसका स्वाद और तुम्हारी नज़रों की मिठास
पोछ डालती है तल्ख एहसासों को,
हर रोज......  एक और दिन मिलता है जीने के लिये,
सुबह की ये चाय और तुम्हारा साथ....
ज़िंदगी बस इत्ती सी तो है.

(image credit google)

Sunday, January 7, 2018

प्रेम खुद से!


प्रेम के बेतहाशा उफ़ान पर 
उड़ जाती है परवाह!
प्रेम खुद से........  दे जाता है उपहार 
खुद को पा लेने का
प्रेम की राह आसान नहीं
बंदिशें हैं,जिम्मेदारियां हैं
नजरें हैं, सवाल हैं, संदेह हैं
प्रेम ही ज़वाब है... 
प्रेम सच्चा है तो आत्मविश्वास है 
प्रेम उल्लास का राग है
प्रेम ही अलाप है 
प्रेम खुद की रूह का एकालाप है
प्रेम खोल देता है दरवाजे बुलंदियों के 
प्रेम की पदचाप;
मधुर है पर है कठिन 
अजीब है पर सच्ची है
प्रेम की राह पर........ चलते चलें 
इस भीड़ में ज़रा खुद को पाते चलें। 

(Image credit google)

Thursday, January 4, 2018

नदी बहती रहे!


बहती हुयी नदी 
अपने साथ लाती है संस्कृतियों की धार, 
न जाने कितने संस्कारों की साक्ष्य बनती है,
जीवन के हर कर्म में साथ साथ जीती है। 

प्रेमी जोड़ों के ख़ूबसूरत एहसास 
बहे चले आते हैं नदी के साथ......... कि 
बस जाती है पूरी की पूरी सभ्यता...
विकसित होती हैं परम्पराएं,
नदी के पेट में सिर्फ पानी ही नहीं होता,
दफ़न होते हैं न जाने कितने राज़ भी........ 

पहाड़ी साँझ का सूर्य भी बहा चला आता है,
मैदानी बाजारों में काम तलाशता है;
खोजता है जीवन की उम्मीद .....कि
ज़िंदगी बहती रहे नदी के साथ.

बड़ी -बड़ी चट्टानें पानी के साथ बहते हुए;
भूल जाती हैं अपना शिलापन,
हजारों मील के सफर में 
गायब हो जाती है उनकी नुकीली धार,
शिलाएं छोटे-छोटे चिकने पत्थर बन  
नन्हे हांथों के खिलौने हो जाती हैं,
मैदानी बच्चों के संग घर-घर घूमती हैं।
नदी ही धार 
कभी काटती है, कभी उखाड़ती है 
तो कभी बसाती है.... 

भूख में ,प्यास में ,सृष्टि के विकास में 
नदी ही सहारा है,
बची रहेगी नदी तो बची रहेंगी सभ्यताएं,
नालों में तब्दील होती नदियाँ 
दे रहीं दरख्वास्त!
ज़िंदा रखो हमें भी 
अपने साथ -साथ।।

(picture credit google)



  

दूर हूँ....कि पास हूँ

मैं बार-बार मुस्कुरा उठता हूँ  तुम्हारे होंठो के बीच, बेवज़ह निकल जाता हूँ तुम्हारी आह में, जब भी उठाती हो कलम लिख जाता हूँ तुम...