Friday, July 20, 2018

स्वाद!

उनकी टपकती खुशी में
छल की बारिश ज़्यादा है,
आँखों में रौशनी से ज्यादा है नमी,
धानी चूनरों में बंधे पड़े हैं कई प्रेम,
ऊब की काई पर तैरती है ज़िंदगी की फसल
गुमनाम इश्क़ की रवायत में,
जल रही हैं उंगलियां,
जल गया है कुछ चूल्हे की आग में,
आज खाने का स्वाद लज़ीज़ है।
©Aparna Bajpai
(Image credit alamy stock photo)

Saturday, July 7, 2018

एक सज़ायाफ्ता प्रेमी

प्रेम करते हुए
अचानक ही वो मूँद लेता है अपनी आँखें
और सिसकता है बेआवाज़,
हमारे प्रगाढ़ आलिंगन से दूर होता हुआ
नज़रें चुराता है,
बोलने की कोशिश में,
साथ नहीं देते होंठ,
बस लरज़ जाती है थोड़ी सी गर्दन,
मेरे प्रेम में आकंठ डूबा हुआ मेरा प्रेमी,
हार जाता है अपने आप से...कि
स्त्री के साथ रहना उसके लिए फांसी है
और स्त्री के बिना रहना मौत...
पुरुषत्व से बाहर आकर खुल जाता है उसका दर्द,
चरम तक पंहुचता हुआ उसका प्रेम,
दम तोड़ देता है बीच राह,
टूटी हुई चूड़ियों में अब भी लगे हैं ख़ून के धब्बे,
उजली चादर पर पसरा है लाल रंग,
प्रेम के संगीत में भरी हैं असंख्य चीखें,
वो उसके पहले प्रेम की आख़िरी चीख थी,
तब से गुमसुम है एक स्त्री उसके भीतर,
एक जीती जागती औरत का मृत जिस्म,
टंगा है उसकी अंतर्मन की दीवार पर,
वो ढो रहा है बलात्कृत स्त्री का दर्द,
और हर बार प्रेम में पड़ने के बाद,
जब भी छूता है किसी स्त्री का तन,
बीच राह भागना चाहता है अपने पुरुषत्व से,
आदिम गंध के बीच छला जाता है अपनी संवेदना से,
कि पुरुष पुरुष नहीं सज़ायाफ्ता है अब।।
#AparnaBajpai

(Image credit Shutterstock.com)




Thursday, July 5, 2018

कविताओं की खेती

आँगन भर भर संजोती हूँ कवितायेँ,
उनके शब्दों में खेल लेती हूँ ताल-तलैया,
कभी कभी चाय के कप में उड़ेल कवितायेँ
चुस्कियां लेती हूँ उनके भावों की,
कवितायेँ भी... पीछा ही नहीं छोड़ती,
धमक पड़ती हैं कभी भी
मानती ही नहीं बिना लिखवाये,
कागज़ की नावों पर सैर कराती
मेघ की मल्हार पर कथक करवाती हैं,
तबले की थाप और बाँसुरी की धुन बनी,
पोर-पोर सरगम सी घुल घुल जाती हैं,
शब्दों के बगीचे में खड़ी मेरी कवितायेँ
अँखियों में लहू बन उतर-उतर जाती हैं,
कागज़ और कलम के बीच अनुभूतियां
कविता के बदन में निचुड़- निचुड़ जाती हैं,
बारिश के दिनों की रोचक अभिव्यक्तियाँ,
नज़्म और कविता बन महक महक जाती हैं,
सूखे से सावन और भीगे हुए भादों में
कवितायेँ ही मन का मीत बन जाती हैं,
उम्र की उल्टी गिनती शुरू होती है जबसे
कवितायें तन का संगीत बन जाती हैं,
चाहती हूँ..... बस यही शब्दों की खेती से;
खेतों खलिहानों में बीज बन उग जाएंगी,
आँगन में संजोयी हुई मेरी सारी कवितायेँ
हर भूखे पेट का चैन बन जाएंगी,
थके हारे नाविक के चरणों को छू कर के
कवितायेँ,उल्लास की देह बन जाएंगी।
#AparnaBajpai 





सूखे मेघ


Tuesday, June 26, 2018

उम्र का नृत्य

उम्र चेहरे पर दिखाती है करतब,
उठ -उठ जाता है झुर्रियों का घूंघट,
बेहिसाब सपनों की लाश अब तैरती 
है आँखों की सतह पर,
कुछ झूठी उम्मीदें अब भी बैठी हैं,
आंखों के नीचे फूले हुए गुब्बारों पर,
याद आते हैं बचपन के दोस्त... 
जो पंहुच पाए किसी ऊंचे ओहदे पर 
कि... ऊपर आने के लिए बढ़ाया न हाँथ कभी,
कुछ दोस्त अब भी हाँथ थाम लेते हैं गाहे-बगाहे
जिनके हांथों में किस्मत की लकीरें न थी,
वक्त - जरूरत कुछ चांदी से चमकते बाल
खड़े हो जाते हैं हौंसला बन
जब चौंक जाता है करीब में सोया बच्चा नींद में ही,
पेट पर फिराता है हाँथ नन्हकू 
और हलक में उड़ेल लेता है 
एक लोटा पानी;
बटलोई में यूं ही घुमाती है चमचा पत्नी
और... पूछती है खाली आँखों से,
कुछ और लोगे क्या!!!!
उम्र की कहानी यूं चलती रहती है
वो भरते रहते हैं हुंकार
कि.... नींद न आ जाए वंहा
जंहा किस्मत खड़ी हो किसी मोड़ पर।
©Aparna Bajpai

(Image credit google)

Saturday, June 16, 2018

आँचल में सीप

तुम्हारी सीप सी आंखें
और ये अश्क के मोती,
बाख़बर हैं इश्क़ की रवायत से...
तलब थी एक अनछुए पल की
जानमाज बिछी;
ख़ुदा से वास्ता बना
तुम्हारी पलकों ने करवट ली
दुआ में हाँथ उठा 
बीज ने कुछ माँग लिया
मेघ बरसे, 
पत्तियों ने अंगड़ाई ली, 
धरती ने हरी साड़ी पहन, 
रेत से हाँथ मिलाया
बाँध लिए सीप मोतियों समेत
आँचल की गिरह में।

#AparnaBajpai



Thursday, June 14, 2018

मौत का सौदा


हाशिये पर खड़े लोग, 
प्रतीक्षारत हैं अपनी बारी की,
उनकी आवाज़ में दम है,
सही मंतव्य के साथ मांगते हैं अपना हक़,
कर्ज के नाम पर बंट रही मौत को 
लगाते हैं गले,
अपनी ही ज़मीन पर रौंद दिये जाते हैं;
कर्ज लेकर खरीदे गए ट्रैक्टर के नीचे,
अपने ही खेत में उगाया गया गन्ना, 
खींच लेता है ज़िंदगी का रस, 
फसल और परती जमीन दोनों ही
बनी हैं गले की फांस....
कि किसान के लिए नयी नयी योजनाएं ला रही है सरकार 
मज़दूर को पलायन
किसान को मौत की रेवड़ी
स्त्री के लिए कन्यादान 
....
सब वस्तुएं ही तो हैं,
ठिकाने लगानी ही होंगी,
सजाना है नया दरबार
विकास अपरंपार 
हाशिये के लोगों को केंद्र में लाना है,
विकास की गंगा में गरीबों को बहाना है,

एक आदमी की मौत की कीमत 
तुम क्या जानो....
बस एक हाँथ रस्सी ,
एक चुटकी ज़हर 
और...सरकार के खोखले वादे ....

#AparnaBajpai

(Image credit google)

Wednesday, June 13, 2018

आदमी होने का मतलब


मैं एक आदमी हूँ 
मौत से भागता हुआ 
भरमाता हुआ ख़ुद को 
कि मौत कुछ नहीं बिगाड़ पायेगी मेरा....

मैं एक कसाई हूँ,
मौत का रोज़गार करता हुआ 
ज़िंदा हूँ अपनी संवेदनाओं समेत
कटे हुए जानवरों की अस्थियों में।

मैं एक रंगरेज़ हूँ
रंगता हूँ मौत के सफ़ेद रंग को 
लाल पीले उत्सवी रंगों में
मेरी दुनिया की दीवारें हैं
झक्क सफ़ेद.... कि मैं सिमटा हूँ मात्र कपड़ों तक..

कहता है आदमी 
कि मैं सिर्फ आदमी हूँ
जबकि आदमी होने से पहले 
वह आदमी बिलकुल नहीं था।

पार कर रहा था वह 
जनन की संधि
गर्भ की सीमा 
पालन का सुख 
संस्कारों की संकीर्णता 
भावुकता की घाटी 
उल्लास की माटी,

सब कुछ पार कर लेने के बावजूद 
आदमी तलाशता है सुरक्षा कवच 
कि अतीत को भूल भविष्य के डर में
मुब्तिला है आदमी ।

(Image credit google)





Saturday, June 9, 2018

देख कर भी जो नहीं देखा !

एक कविता.... कुछ अदेखा सा जो यूं ही गुज़र जाता है व्यस्त लम्हों के गुजरने के साथ और हम देखकर भी नहीं देख पाते , न उसका सौंदर्य , न उसकी पीड़ा, न ख़ामोशी , और न ही संवेग
 सब कुछ किसी मशीन से निकलते उत्पाद की तरह होता जाता है और हमारा संवेदनशून्य होता मष्तिष्क कुछ भी ग्रहण नहीं कर पाता।


Friday, June 8, 2018

कहो कालिदास , सुनें मेरी आवाज़ में

विद्वता के बोझ तले दबे हर पुरुष को समर्पित यह कविता मेरी आवाज़ में सुनें...
यह कविता आप इससे पूर्व वाली पोस्ट में पढ़ भी सकते हैं...

Thursday, June 7, 2018

दहलीज़ पर कालिदास


कहो कालिदास,
आज दिन भर क्या किया,
धूप में खड़े खड़े पीले तो नहीं पड़े,
गंगा यमुना बहती रही स्वेद की
और तुम.... उफ़ भी  नहीं करते ,

कहो कालिदास,
कैसा लगा मालविका की नज़रों से विलग होकर,
तुम लौट-लौट कर आते रहे उसी दहलीज़ पर
मन में कौंधती रही दाड़िम दंतपंक्ति
मुस्कुराहटें संभालते रहे प्रेम की पोटली में
लौट नहीं पाते उसी द्वार
खुद से वादा..... प्रेम से ज्यादा जरूरी है?

कहो कालिदास,
विद्वता की गरिमा ओढ़
थके तो नहीं,
इससे तो अच्छा था कि
बैठे रहते उसी डाल पर
जिसे काट रहे थे,
गिरते तो गिरते, मरते तो मरते,
जो होना था हो जाता
महानता का बोझ तो न ढोना पड़ता,

अरे कालिदास!
महानता की दहलीज़ के बाहर आओ,
ज़रा मुस्कुराओ,
कुछ बेवकूफियां करो
कुछ नादानियाँ करो,
बौद्धिकता का खोल उतारो
हंसो खुल के
जियो खुल के,

अरे कालिदास!
एक बार तो जी लो अपनी ज़िंदगी।

(हर पुरुष के भीतर बैठे कालिदास को समर्पित)
(Image credit Shutterstock)

Wednesday, May 30, 2018

एक चिड़िया का घर

एक चिड़िया उड़ती है
बादलों के उस पार..
उसकी चूं-चूं सुन,
जागता है सूरज,
उसके पंखों से छन कर, 
आती है ठंढी हवा,
 गुनगुनाती है जब चिड़िया,
आसमान तारों से भर जाता है,
धरती से उठने वाली; 
साजिशों की हुंकार सुन;
चिड़िया जब-तब कराहती है,
उसकी आँखों से बहती है आग,
धरती पर बहता है लावा,
रोती हुई चिड़िया को देख
उफनते हैं ज्वालामुखी,
सूख जाती हैं नदियां,
मुरझा जाते हैं जंगल,
आजकल चिड़िया चुप है!
उदास हैं उसके पंख, 
चिड़िया कैद है रिवाज़ों के पिटारे में
ज़रा गौर से देखो
संसार की हर स्त्री की आँखें!
वह चिड़िया वंही रहती है....

(Image credit google)



Monday, May 28, 2018

ये सरकारी कार्यालय है!


अजी ये भी कोई वक़्त है,
दिन के बारह ही तो बजे हैं,
अभी-अभी तो कार्यालय सजे हैं,
साहब घर से निकल गए है,
कार्यालय नहीं आये तो कंहा गए हैं,
ज़रा चाय-पानी लाओ,
गले को तर करवाओ,
सरकारी कार्यालय है,
भीड़ लगना आम है,
इतनी भी क्या जल्दी है
आराम से काम करना ही हेल्थी  है,
दौड़ भाग में काम करवाओगे,
मुझे भी मेडिकल लीव में भेजवाओगे,
आराम से बैठो,
आज नहीं तो कल काम हो ही जायेगा,
सूरज कभी न कभी निकल ही आयेगा,
सरकारी व्यवस्था में ऐसा ही होता है,
नौ की जगह काम एक बजे शुरू होता है,
सवाल करना बेकार है,
हमारा ही आदमी है,
हमारी ही व्यवस्था है,
जो कोई देखे सुने
वो गूंगा, बहरा अँधा है,
मुंह पर चुप रहने की सिलिप लगाओ,
व्यवस्था को कोसने से बाज आओ,
जंहा जाओगे यही हाल मिलेगा
कर्मचारी ग़ायब, शिकायतों का अंबार मिलेगा।

(Image credit google)


Wednesday, May 23, 2018

नया इतिहास




मेरी जेबों में
तुम्हारा इतिहास पड़ा है
कितना बेतरतीब था;
तुम्हारा भूत.....
वक्त की नब्ज़ पर हाँथ रख,
पकड़ न पाया
समाज का मर्ज़,
मुगालते में ही रहा;
कि... वक्त मेरी मुट्ठी में है,
कानों में तेल डाल,
 सुनता रहा,
अपनी ही गौरव-गाथा!

तब तक 
झुका लिया मैंने,
घड़ी की सुइयों को अपनी ओर,
अब रचा जा रहा है
नया इतिहास......
प्रेम के दस्तावेजों में
नफ़रत नहीं अमन के गीत हैं
सरहदों पर खून के धब्बे नहीं
गुलाब की फसलें हैं, 
शेष बहुत कुछ बचा है  
इतिहास के पन्नों में जुड़ने को...
जैसे नदी की कथा,
हवा की व्यथा,
खतों का दर्द,
जुबां का फ़र्ज़, 
शर्म का नकाब,
गरीबों का असबाब,
और भी बहुत कुछ
बहुत कुछ बहुत कुछ......
तुम कुछ कहते नहीं!!!!
इस इतिहास में तुम्हारी भी कथा होगी
जो चाहो लिखना
बस झूठे दंभ का आख्यान मत लिखना.

(Image credit Pixabay.com)

Thursday, May 17, 2018

माँ बनना.... न बनना

लेबर रूम के बेड पर तड़पती हुई स्त्री 
जब देती है जन्म एक और जीव को 
तब वह मरकर एक बार फिर जन्म लेती है
अपने ही तन में,
अपने ही मन में,
उसके अंतस में अचानक बहती है एक कोमल नदी
जिसे वह समझती है धीरे धीरे;
लेकिन दुनिया उस नदी की धार से 
हरिया जाती है,
माँ बनना आसान नहीं होता

और

माँ न बनना....
उससे भी ज्यादा कठिन,
सवालों और तिरछी नज़रों के जख़्म 
लेबरपेन से ज्यादा कष्टकारी होते है,
कि दुनिया हर उस बात के लिए सवाल करती है
जो आप नहीं होते...
औरत के लिए माँ बनना न बनना
उसकी च्वाइस है
न कि उसकी शारीरिक बाध्यता.
यदि न दे वो संतान को जन्म 
स्त्री का ममत्व मर तो नहीं जाता 
न ही सूख जाती है
उसकी कोमल भावनाओं की अन्तःसलिला
औरत जन्म से ही माँ होती है
सिर्फ तन से नहीं
मन से भी..

(Image credit Pixabay)





Monday, May 14, 2018

मैंने देखा है.... कई बार देखा है


मैंने देखा है,
कई बार देखा है,
उम्र को छला जाते हुए,
बुझते हुए चराग में रौशनी बढ़ते हुए,
बूढ़ी आँखों में बचपन को उगते हुए
मैंने देखा है...
कई बार देखा है,
मैंने देखा है 
बूँद को बादल बनते हुए,
गाते हुए लोरी बच्चे को
माँ को नींद की राह ले जाते हुए,
मैंने देखा है,
कई बार देखा है...
एक फूल पर झूमते भंवरे को;
उदास हो दूसरी शाख़ पर मंडराते हुए,
सूखते हुए अश्क़ों को
गले में नमी बन घुलते हुए,
मैंने देखा है
कई बार देखा है....
शब्द को जीवन हुए
कंठ को राग बन बरसते हुए,
उँगलियों को थपकी बन
कविता की शैया पर सोते हुये,
मैंने देखा है.....
कई बार देखा है
जब जब देखती हूँ कुछ अनकही बातें
लगता है जैसे 
कुछ भी नहीं देखा है...
कुछ भी नहीं देखा है ...

(Image credit to Pinterest)




Wednesday, May 9, 2018

Saturday, May 5, 2018

इंतज़ार एक किताब का!


उसने मुझे बड़ी हसरत से उठाया था,
सहलाया था मेरा अक्स,
स्नेह से देखा था ऊपर से नीचे तक, 
आगे से पीछे तक,
होंठों के पास ले जाकर
हौले से चूम लिया था मुझे 
और.... बेसाख्ता नज़रें घुमाई थीं चारों ओर
कि...... किसी ने देखा तो नहीं!
 मैं ख़ुश थी उन नर्म हथेलियों के बीच 
कितनी उम्मीद से घर आयी थी उसके 
कि.... अब रोज 
उन शबनमी आंखों का दीदार होगा, 
 उन नाज़ुक उँगलियों से छुआ जाएगा
मेरा रोम-रोम
पर......
मैं बंद हूँ इन मुर्दा अलमारियों के बीच 
मेरी खुशबू मर गयी है,
ख़त्म हो रहे हैं मेरे चेहरे के रंग....
लाने वाली व्यस्त है घर की जिम्मेदारियों में....
बस 
एक तड़प बाक़ी है,
उसकी आँखों में मुझे छूने की, 
वो काम की कैद में है 
और मैं अलमारी की ....
वो मुझे चाहती है, 
और मैं उसे, 
इन्तजार है, 
उसे भी, 
मुझे भी,
एक दूसरे के साथ का!

(Image credit google)





Monday, April 30, 2018

हिंदी कविता - दुनिया का सच

मेरी कविता 'दुनिया का सच' सुनें मेरी आवाज़ में जो की सामाजिक बाज़ार में स्त्री की व्यथा से आपको रूबरू करवाती है।

आपकी प्रतिक्रियाएं मेरे लिए अमूल्य हैं 
कृपया अपनी प्रतिक्रियाएं अवश्य दें ताकि इस नयी राह पर आपके सुझावों का हाँथ पकड़ कर आगे बढ़ सकूं।

Tuesday, April 24, 2018

दूर हूँ....कि पास हूँ


मैं बार-बार मुस्कुरा उठता हूँ 
तुम्हारे होंठो के बीच,
बेवज़ह निकल जाता हूँ तुम्हारी आह में,
जब भी उठाती हो कलम
लिख जाता हूँ तुम्हारे हर हर्फ़ में,
कहती हो दूर रहो मुझसे....
फ़िर क्यों आसमान में उकेरती हो मेरी तस्वीर?
संभालती हो हमारे प्रेम की राख; 
अपने ज्वेलरी बॉक्स में,
दूर तो तुम भी नहीं हो ख़ुद से
फ़िर मैं कैसे हो सकता हूँ?
तुम्हारे तलवे के बीच
वो जो काला तिल है न;
मैं वंही हूँ,
निकाल फेंको मुझे अपने वज़ूद से, 
या यूँ ही पददलित करती रहो,
उठाओगी जब भी कदम,
तुम्हारे साथ -साथ चलूंगा,
और तुम!
धोते समय अपने पैर,
मुस्कुराओगी कभी न कभी.

#अपर्णा बाजपेई

(Image credit to dretchstorm.com)




Thursday, April 19, 2018

झूठे बाज़ार में औरत


एक पूरा युग
अपने भीतर जी रही है स्त्री,
कहती है ख़ुद को नासमझ,
उगाह नहीं पायी अब तक
अपनी अस्मिता का मूल्य,
मीडिया की बनाई छवि में
घुट-घुट कर होंठ सी लेती है स्त्री,
सड़कों पर कैंडल मार्च करती भीड़ में
असली भेड़ियों को पहचान लेती है स्त्री 
चुप है,
कि उसके नाम पर 
उगाहे जा रहे हैं प्रशस्ति पत्र,
रुपयों की गठरियाँ सरकाई जा रही हैं
गोदामों में,
स्त्री विमर्श के नाम पर
झूठ के पुलिंदों का
अम्बार लग रहा है,
लोग खुश हैं!
कि रची जा रही है 
स्त्री की नई तस्वीर,
खोजती हूँ
कि इस तस्वीर से 
आम औरत ग़ायब है?

(Image credit google)


Monday, April 16, 2018

एक कवि से उम्मीद!


लिखो प्रेम कवितायेँ
कि..... प्रेम ही बचा सकेगा
तिल-तिल मरती मानवता को,
प्रेम की अंगड़ाई जब घुट रही हो सरेआम,
मौत के घाट उतार दिए जा रहे हों प्रेमी युगल,
कल्पना करो
प्रेम के राग में सड़ांध भरती सिक्कों की खनक को,
प्रेम की दीवारों पर लचक रहे हैं खून के धब्बे,
अपने आप में विलुप्त होता इंसान
भूल रहा है;
माँ की आँखों से बह रहा प्रेम,
पत्नी की सिसकियों की लय हो रही बेज़ुबान,
बरस रही हैं आसमान से 
प्रेम के विरोध में फतवों की धमक,
किताबों से मिटाया जा रहा है प्रेम का हर अक्षर,
तब उम्मीद सिर्फ तुम्ही से है दोस्त!
कि लिखो तुम प्रेम की अपूर्ण रह गयी कहानियां,
अपनी कविताओं में प्रेम पर हो रहे अत्याचार की चिन्दियाँ करो,
भरो प्रेम का राग हर कंठ में,
तुम्हारी कविताओं में जिंदा रह गया प्रेम;
बोयेगा बीज एक दिन,
धरती पर प्रेम ही खेती लहलहायेगी,
प्रेम के अवशेष 
खड़े कर ही लेंगे 
कभी न कभी मानवता की अटारियां,
प्रेम को नया जीवन दो,
लिखो प्रेम के आख्यान,
करो रंगों, फूलों, तितलियों की बातें,
विश्वास है मुझे ;
बचा सकती हैं प्रेम कवितायें ही
इस संसार को मरघट बनने से....

(श्वेता जी की कविता की प्रतिक्रिया स्वरुप लिखी गई कविता)
(Image credit Google)

Friday, April 13, 2018

डरती हूँ मैं!


जब भी, 
फ़िर से, 
काम पर जाने की इच्छा, 
उठाती है सिर,
ज़मीदोज़ कर देती हूँ उसे,
आख़िर एक नन्ही सी बच्ची की माँ जो हूँ......
घर में, 
मंदिर में, 
अस्पताल में, 
स्कूल में, 
सड़क पर,
बस में,
ट्रेन में.... 
सब जगह हो सकता है बलात्कार!
आठ महीना, 
दो साल, 
तीन साल,
पांच साल,
सात साल, 
दस साल 
किसी भी उम्र में हो सकता है बलात्कार!
क्या करूँ, कंहा रखूँ उसे 
जंहा वो रहे महफूज़ हर बुरी नज़र से...
डरती हूँ कि..... 
नन्ही सी बच्ची, 
नहीं समझती 
गलत हरकतें,
समझ नहीं पाती
गंदे इशारे,
दौड़ जाती है 
एक चॉकलेट के लालच में
हर एक की गोद में,
हर इंसान को समझती है अपना,
नहीं जानती,
इंसान की शक्ल में,
दौड़ रहे हैं भेड़िए,
कब किसे कंहा दबोच लें
कोई पता नहीं.

(Image credit google)

Thursday, April 12, 2018

विदा का नृत्य




मैं तुममें उतना ही देखता हूँ,
जितना बची हो तुम मुझमें,
किंवाड़ से लगकर भीतर झांकती तुम्हारी आँखें,
निकाल ले जाती हैं मुझे
पूरा का पूरा,
जीवन भर,
पुआल के ढेर पर सोता मैं,
सुस्ताता हूँ थोड़ी देर,
डनलप के गद्दों पर,
नींद आजकल सो रही है 
खेत के मेढ़ सी,
न इधर न उधर,
तराशता हूँ जब भी तुम्हारा बुत,
ख़्वाब में भी फूट जाते हैं,
तुम्हारी देह पर पड़े फ़फोले,
अपनी बुतपरस्ती देख,
रेशा-रेशा दहकता हूँ मैं,
भागता हूँ ख़ुद से दूर,
खो जाता हूँ किसी लोक धुन में,
नाचता हूँ सुखाड़ के गीतों पर भी,
अपने पैरों के जख़्मी होने तक,
अनंत यात्रा पर निकलता हूँ,
छोड़ जाता हूँ ये खलिहान,
कि...फसलें उगाने के दिन बीत गए हैं।
(Image credit google)

Saturday, April 7, 2018

समय की उड़ान


ढिबरी की रौशनी में पढ़ती हुई लड़की
भरती है हौंसलों की उड़ान,
अंतरिक्ष का चक्कर लगाती है
चाँद तारों को समेट लाती है अपनी मुट्ठी में,
जब जब आंसुओं के मोती देखती है
माँ की आँखों में,
खिलखिलाकर एक सूरज उगाती है
उसके होंठों पर,
माँ की बिवाइयों पर लगाती है
अपनी परवाज़ का लेप,
पिता की टोपी पर
जड़वाती है अपनी क़ाबिलियत के हीरे,
एक दिन ढिबरी की रौशनी में
पढ़ती हुयी लड़की;
लाती है बदलाव की बयार
रौंद देती है ज़ुल्मो सितम की कहानियां.....
फ़िर कोख से कब्र तक
उसके होने पर जलाये जाते हैं खुशियों के चिराग
उल्लास के गीतों में होता है उसका स्वागत
ढिबरी की रौशनी में पढ़ती हुयी लड़की
बन जाती है समय की उड़ान......
हमारे घरों में मुस्कुराती है,
खुशियों के गहने
सबके होठों पर सजाती है।

(Image credit google)



Friday, April 6, 2018

पूर्ण विराम कंहा है!


एक नृशंस कालखंड दर्ज हो रहा है इतिहास में
            भीड़ की तानाशाही और रक्तिम व्यवहार
ताकत का अमानवीय प्रदर्शन
क़ानून की धज्जियाँ उड़ाता शाशन-प्रशासन....

हिंसा हथियार है और अविवेक मार्गदर्शक
खौफ़नाक मंसूबे उड़ान भर रहे हैं
ये हम किस युग में जी रहे हैं!
किसका ज़्यादा खून बहा
किसकी ज्यादा हुयी हार,
कौन बैठा है कुर्सी पर
कौन छील रहा घास,

बर्बर है सोच....
मौत का बदला मौत!

क्या मौत के बाद भी मरता है वक़्त?
चुकती हैं रक्त पिपासु आदतें?
पूर्ण विराम खोज रही हूँ
जाने कंहा चला गया....

(Image credit google)

Thursday, March 29, 2018

अंत हुआ तो ख़ाली दामन


फूल यूं मुस्कुराये कि गिर गए
शाख़ को गमज़दा छोड़कर, 
तितलियां आजकलनहीं आती
झर रहीं पत्तियां बेसबब यूं ही।

रात तूफ़ां ने यूं क़यामत की
झुग्गियां उजड़ी, मर गयी साँसे,
गिर गए ईमान संग दरख़्त कितने
कब्र खोदी और छुप गयीं खुशियां।

धूप की चिन्दियाँ यूं बिखरी हैं
जैसे सोना बिछा हो धरती पर,
मुट्ठियाँ बांधता मुसाफ़िर जब
धूप साये सी हाँथ नहीं आती ।

वजन में दो गुनी हुईं बातें
काफ़िले हाकिमों के घेरे हैं,
गिनती निवालों की हो रही है यहाँ
जिनसे उम्मीद वो मुंह को फेरे हैं।

कोठियां भर गयी हैं नोटों से
दिल है सूना के नींद नहीं आती,
उम्र भर लूटता रहा दौलत
आज लगता के हाँथ खाली है।

(Image credit google)




Tuesday, March 27, 2018

धार्मिक तन्हाई का दंश

धर्म का लाउडस्पीकर
जब उड़ेलता है उन्माद का गंदा नशा
हाँथ पैर हो जाते हैं अंधे,
नौजवान खून उबाल मारता है,
मासूम हाँथ रंग जाते हैं अपनों के खून से,
ज़ालिम दिमाग़ कोनों में मुस्कुराते हैं,
राजनीति की रोटियां सिंकती हैं
बेगुनाहों की चिता पर,
कानून के हांथ आये नादान लोग
जेल की तन्हाई में काटते हैं जवानी,
पैदा होती है अपराधियों की एक और पौध,
कुछ और शातिर दिमाग
सीखते हैं मक्कारी,
चल पड़ते हैं उसी राह पर
कि दूर कर दो बच्चे को बच्चे से,
फ़िर कभी धर्म के नाम पर खुशियां न मन सकें.
(Image credit google)





स्वाद!

उनकी टपकती खुशी में छल की बारिश ज़्यादा है, आँखों में रौशनी से ज्यादा है नमी, धानी चूनरों में बंधे पड़े हैं कई प्रेम, ऊब की काई पर...