Monday, January 29, 2018

अच्छे बच्चे


अच्छे बच्चे रोते नहीं 
न ही करते हैं जिद 
भूख लगने पर माँगते नहीं खाना 
ललचाई हुयी नज़रों से देखते नहीं भरी हुयी थाली। 
अच्छे बच्चे कहना मानते हैं माँ-बाप का 
फटे कम्बल में सो जाते हैं
 ठिठुरते हुए पैर मोड़ कर.....  
पार्टियों की पत्तलों से खोज लेते हैं अपना हिस्सा 
छोटे भाई बहनों को खिलाते हैं पहले। 
अच्छे बच्चे स्कूल नहीं जाते 
भोर अँधेरे काम पर जाते हैं 
कमाकर भरते हैं पेट परिवार का 
खेलने की उम्र में सीख जाते हैं दुनियादारी। 
अच्छे बच्चे बचपन में ही ओढ़ लेते हैं बुढ़ापा 
खिलखिलाते नहीं, रोते नहीं, उड़ते नहीं 
अच्छे बच्चे जन्म से ही बड़े हो जाते हैं 
बन जाते हैं आदमी 
अच्छे या बुरे 
दुनिया जानती है!

(Picture credit google)

7 comments:

  1. वाह!!क्या खूब लिखा है।

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    1. सादर आभार शुभा दी

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  2. हृदयस्पर्शी रचना अपर्णा जी।
    भावुक करती पंक्तियाँ।

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    1. शुक्रिया श्वेता जी

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  3. जहां पेट नही भरता वहां संस्कार की बाते बस थोथा दिखावा है।
    यथार्थ रचना व्यंग और मर्म पर प्रहार करती।
    गरीबों का कावय ,समाज ,और रचनात्मकता कितनी।
    एक उद्धरण पढें।

    "भारत के विस्तृत आकाश के नीचे मानव -पक्षी रात को सोने का ढ़ोंग करता है, भुखे पेट उसे जरा भी नींद नही आती और जब वह सुबह बिस्तर से उठता है तब उसकी शक्ति पिछली रात से कम हो जाती है।
    लाखों मानव-पक्षीयों को रात भर भूख प्यास से पीड़ित रहकर जागरण करना पड़ता है अथवा जाग्रत सपनों मे उलझे रहना पड़ता है ।यह अपने अपने अनुभव की, अपनी समझ की, अपनी आँखों देखी अकथ दुखपूर्ण
    अवस्था और कहानी है। कबीर के गीतों से इस पीड़ित मानवता को सान्त्वना दे सकना असम्भव है ।यह लक्षावधि भूखी मानवता हाथ फैलाकर, जीवन के पंख फड़फड़ाकर
    कराहकर केवल एक कविता माँगती है _पौष्टिक भोजन ।"

    श्री विष्णुप्रभाकर जी के एक उपन्यास
    " तट के बंधन " से लिया ये एक पत्र है जो महात्मा गांधी ने रविन्द्र नाथ टैगोर को लिखा था ।

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  4. आदरणीय कुसुम दी , कविता के बहाने आपने इतना महत्वपूर्ण उद्धरण पढ़ने के लिए दिया इसके लिए साधुवाद। हर भूखे पेट के लिए कविता सिर्फ भोजन है । हम वही चाहते हैं जिसकी जरुरत हमें सबसे ज़्यादा होती है । कई सालों तक साक्षी रही हूँ ऐसी भूख की कि कलम जब उठती है तो वही लिखती है जो इन आँखों ने भोगा है । बच्चे अभावों में भी इस तरह जीते हैं कि बड़ों बड़ों को ज़िंदगी का फ़लसफ़ा सीखा देते हैं ।
    कविता पर आपकी राय मिलती है तो लिखने का उत्साह जगता है । सादर आभार

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  5. बहुत ही हृदयस्पर्शी रचना....
    वाह!!!

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