Saturday, June 9, 2018

देख कर भी जो नहीं देखा !

एक कविता.... कुछ अदेखा सा जो यूं ही गुज़र जाता है व्यस्त लम्हों के गुजरने के साथ और हम देखकर भी नहीं देख पाते , न उसका सौंदर्य , न उसकी पीड़ा, न ख़ामोशी , और न ही संवेग
 सब कुछ किसी मशीन से निकलते उत्पाद की तरह होता जाता है और हमारा संवेदनशून्य होता मष्तिष्क कुछ भी ग्रहण नहीं कर पाता।


2 comments:

  1. वाह ... बहुत ही खूबसूरती से इस रचना को कहा है आपने ...
    ये अंदाज़ कमाल का है ... कहते हुए जैसे आपने सच में देख लिया ...

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  2. मन की आंखों से सब कुछ देख लिया सखी।
    वाह!!

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आँचल में सीप

तुम्हारी सीप सी आंखें और ये अश्क के मोती, बाख़बर हैं इश्क़ की रवायत से... तलब थी एक अनछुए पल की जानमाज बिछी; ख़ुदा से वास्ता बन...