Monday, April 16, 2018

एक कवि से उम्मीद!


लिखो प्रेम कवितायेँ
कि..... प्रेम ही बचा सकेगा
तिल-तिल मरती मानवता को,
प्रेम की अंगड़ाई जब घुट रही हो सरेआम,
मौत के घाट उतार दिए जा रहे हों प्रेमी युगल,
कल्पना करो
प्रेम के राग में सड़ांध भरती सिक्कों की खनक को,
प्रेम की दीवारों पर लचक रहे हैं खून के धब्बे,
अपने आप में विलुप्त होता इंसान
भूल रहा है;
माँ की आँखों से बह रहा प्रेम,
पत्नी की सिसकियों की लय हो रही बेज़ुबान,
बरस रही हैं आसमान से 
प्रेम के विरोध में फतवों की धमक,
किताबों से मिटाया जा रहा है प्रेम का हर अक्षर,
तब उम्मीद सिर्फ तुम्ही से है दोस्त!
कि लिखो तुम प्रेम की अपूर्ण रह गयी कहानियां,
अपनी कविताओं में प्रेम पर हो रहे अत्याचार की चिन्दियाँ करो,
भरो प्रेम का राग हर कंठ में,
तुम्हारी कविताओं में जिंदा रह गया प्रेम;
बोयेगा बीज एक दिन,
धरती पर प्रेम ही खेती लहलहायेगी,
प्रेम के अवशेष 
खड़े कर ही लेंगे 
कभी न कभी मानवता की अटारियां,
प्रेम को नया जीवन दो,
लिखो प्रेम के आख्यान,
करो रंगों, फूलों, तितलियों की बातें,
विश्वास है मुझे ;
बचा सकती हैं प्रेम कवितायें ही
इस संसार को मरघट बनने से....

(श्वेता जी की कविता की प्रतिक्रिया स्वरुप लिखी गई कविता)
(Image credit Google)

9 comments:

  1. बेहद लाज़वाब,बहुत-बहुत सुंदर सकारात्मकता से भरी शानदार रचना।
    अति आभार आपका अपर्णा जी,मेरी कविता के भावों को समझने के लिए।
    प्रेम के बिना जीवन का कोई अस्तित्व नहीं हम भी मानते है।

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  2. पर क्या ऐसे माहिर में प्रेम लिखना सम्भव हो पाएगा ...
    क्या आँखों के सामने भयानक मंज़र नहि आएगा ... प्रेम तभी तक कारगर है जब तक संवेदना है ... जब को
    नहीं तो कुछ भी नहीं ...

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  3. आपकी लिखी रचना आज "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 18अप्रैल 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. बहुत सुंदर।
    बस एक प्रेम ही तो है जो शाश्वत है।

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  5. हे मृगनयनी , गजगामिनी, त्याग के तुम श्रृंगार
    अपने रक्षण हेतु लो हाथों में तलवार......बहुत खूब

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  6. बहुत सुंदर
    प्रेम से ये संसार है

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  7. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 19.04.2018 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2945 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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    Replies
    1. जी बहुत बहुत आभार
      सादर

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