Wednesday, November 28, 2018

खरीद -फ़रोख़्त (#Human trafficking)


बिकना मुश्किल नहीं
न ही बेचना,
मुश्किल है गायब हो जाना,
लुभावने वादों और पैसों की खनक
खींच लेती है
इंसान को बाज़ार में,
गांवो से गायब हो रही हैं बेटियां,
बेचे जा रहे हैं बच्चे,
आंखों से लुढ़कने वाले आँसू
रेत का दामन थाम
बस गए हैं आंखों में,
लौट आने की उम्मीद में,
गायब हो रही हैं पगडंडियां,
उदास हैं अम्मी और अब्बू!
न पैसे न औलाद,
कोई नहीं लौटता,
निगल लेती है मजबूरी,
गुम हो रही है पानी से तरंग
ख़ाली गांव, ख़ाली घर
सन्नाटे के सफ़र पर
चल निकला है आदमी.... कि
बाज़ार  निगल गया है रिश्तों की गर्माहट।

#AparnaBajpai

Wednesday, October 24, 2018

मंदिर में महिलाएं


अधजगी नींद सी
कुछ बेचैन हैं तुम्हारी आंखें,
आज काजल कुछ उदास है
थकान सी पसरी है होंठों के बीच
हंसी से दूर छिटक गई है खनक,
आओ न,
अपनी देह पर उभर आए ये बादल,
सृजन की शक्ति के सार्थक चिन्हों का स्वागत करो,
पांवों में दर्द की सिहरन को उतार दो
कुछ क्षण ,
राधे! आज मंदिर की शीतल सिला पर
सुकून की सांस लो,
सृष्टि की अनुगामिनी हो,
लाज का नहीं, गर्व का कारण है ये,
रजस्वला हो,
लोक-निर्माण की सहगामिनी!
मेरी सहचर!
स्त्री के रज से अपवित्र नही होता
 मैं, मंदिर और संसार
फ़िर.. ये डर..क्यों? 
कृष्ण ने राधा से कहा.
#AparnaBajpai

Tuesday, October 9, 2018

#me too

भीतर कौंधती है बिजली,
कांप जाता है तन अनायास,
दिल की धड़कन लगाती है रेस,
और रक्त....जम जाता है,
डर
बोलता नहीं
कहता नहीं,
नाचता है आंख की पुतलियों के साथ,
कंपकंपाते होंठ और थरथराता ज़िस्म,
लुढ़कता है आदिम सभ्यता की ओर,
तन पर कसे कपड़े
होते तार-तार
आत्मा चीखती है
घुट जाती आवाज़ भीतर ही,
 बच्ची... जैसे जन्म से होती है जवान,
वासना की लपलपाती जीभ
भस्म कर देती है सारे नैतिक आवरण,
आवाज़ तेज कर लड़की,
बाज़ार के ठेकेदार,
भूल रहे है तुम्हारी कीमत
डरना गुनाह है,
डराया जाएगा आजन्म,
पर हिम्मत भीतर ही है,
खोजो और खींच लाओ बाहर!
तुम्हारे सच पर भरोसा है,
तुम्हे भी, मुझे भी
मैं भी हूँ तुम्हारी आवाज़ में,
ऐ जांबाज़ हमसफ़र
भरोसा!!
#me too



Wednesday, October 3, 2018

उम्र का हिसाब

उस दिन कुछ धागे
बस यूं ही लपेट दिए बरगद में,
और जोड़ने लगी उम्र का हिसाब
उंगलियों पर पड़े निशान,
सच ही बोलते हैं,
एक पत्ता गिरा,
कह गया सच,
धागों से उम्र न बढ़ती है,
न घटती है,
उतर ही जाता है उम्र का उबाल एक दिन,
जमीन बुला लेती है अंततः
बैठाती है गोद,
थपकियों में आती है मौत की नींद,
छूट जाते हैं चंद निशान
धागों की शक्ल में.....
बरगद हरियाता है,
हर पतझड़ दे बाद,
जीवन भी......

Wednesday, September 26, 2018

प्रेम-राग

बड़ा पावन है
धरती और बारिश का रिश्ता,
झूम कर नाचती बारिश और
मह-मह महकती धरती;
बनती है सृष्टि का आधार,
उगते हैं बीज,
नए जीवन का आगाज़,
शाश्वत प्रेम का अनूठा उपहार,
बारिश और धरती का मधुर राग,
उन्मुक्त हवाओं में उड़ती,
सरस संगीत की धार,
तृप्त जन, मन, तन
तृप्त संसार.
#AparnaBajpai

Sunday, September 16, 2018

समलैंगिक प्रेम

बड़ा अजीब है प्रेम,
किसी को भी हो जाता है,
लड़की को लड़की से,
लड़के को लड़के से भी,
समलैंगिक प्रेम खड़ा है कटघरे में,
अपराध है सभ्य समाज में,
नथ और नाक के रिश्ते की तरह,
बड़ा गज़ब होता है,
एक होंठ पर दूसरे होंठ का बैठना,
बड़ी चतुर होती है जीभ दांतों के बीच,
कभी-कभी पांच की जगह छः उंगलियां भी
रोक नहीं पाती एशियाड में सोना मिलने से,
गोरी लड़की के काले मसूढ़े भी,
बन जाते हैं कुरूपता के मानक,
एक दांत पर दूसरे दांत का उग आना,
गाड़ देता है भाग्य के झंडे,
इस समाज में अजीब बातें  भी
हो जाती हैं स्वीकार,
फ़िर, समलैंगिक प्रेम!
क्यों रहा है बहिष्कृत?
क्यों है यह अपराध?
जिस समाज में प्रेम ही हो कटघरे में
वंहा समलैंगिकता पर बात!

हुजूर, आप की मति तो मारी नहीं गई,
विक्षिप्तता की ओर भागते दिमाग को रोकिये,
गंदी बातें कर पुरातन संस्कृति पर छिड़कते हो तेज़ाब,
ज़ुबान न जला दी जाए आपकी....
साफ़ सुथरी कविता लिखिए,
फूल ,पत्ती, चांद, धरती कितना कुछ तो है,
देखने सुनने को,
फ़िर...
अपनी मति पर कीचड़ मत पोतिये,
कुछ बातें सिर्फ़ किताबों के लिए छोड़िये,
प्रेम के अंधेरे गर्तों को मत उलीचिये,
रहने दीजिए अभिशप्त को अभिशप्त ही,
ज्यादा चूं-चपड़ में मुंह मत खोलिये।।

#AparnaBajpai

Saturday, August 25, 2018

भीड़ का ज़मीर

मैं इस बार मिलूँगी
भीड़ में निर्वस्त्र,
नींद जब भाग खड़ी होगी दूर
आँख बंद होने पर दिखेगी सिर्फ भीड़,
बाहें पसारते ही सिमट जायेगा तुम्हारा पौरुष,
तब, झांकना अपने भीतर
एक लौ जलती मिलेगी
वंही;
जंहा, जमा कर रखा है तुमने मुझे,
बरसों बरस.....
सूखी रेत पर झुलसते पैरों तले,
जब बुझा दिए गए थे सम्मान के दीप्त दिए,
जब सड़क पर भाग रही थी अकेली स्त्री, 
हजारों दानवों के बीच,
मैं मर गयी थी तुम्हारे भीतर;
एक लाश अटकी है तुम्हारी पुतलियों पर
उठाओ!!!
क्या तुम्हारे ज़मीर से ज्यादा भारी है,
सड़ी हुयी लाशें भारी हो जाती हैं,
और सड़ा हुआ जमीर....

भीड़ का कोई जमीर नहीं होता ।।
#Aparna Bajpai

खरीद -फ़रोख़्त (#Human trafficking)

बिकना मुश्किल नहीं न ही बेचना, मुश्किल है गायब हो जाना, लुभावने वादों और पैसों की खनक खींच लेती है इंसान को बाज़ार में, गांवो...