संदेश

आदिवासियों के घर और रहन- सहन

चित्र
  आइए देखते है किस प्रकार तैयार करते हैं #झारखंड   के  #आदिवासी समुदायों के लोग अपने घरों को। प्राकृतिक तरीके और साम्रगी से तैयार की जाती है #WallPutty aur #walldecor के लिए इस्तेमाल किए जाते है #chamicalfreecolours #environmentfriendly , #womenemployment, दिवाली की तैयारियों में आप भी ग्रामीण महिलाओं को रोजगार उपलब्ध करा सकते हैं इन्हें अपने घरों के रंग रोगन और साज सज्जा में शामिल कर सकते हैं। इसी बहाने दूसरों के घर भी रौशन हो जाएंगे। 

चाहती हूँ लौट जाना

चित्र
 

बिन पानी की बूंद

चित्र
  Image credit pexel  बिखरती हुई औरतें समेटी नहीं जाती  फिसल जाती हैं रेत की मानिंद  दिखाई नहीं पड़ती तुमसे दूर होती हुई  दर्द में लिपटी हुई औरतें खुशी का नकाब लगा मिलती हैं,  तुम्हें दिखता है अधूरा सच, बारिश की बूँदों में तुम सिर्फ़ पानी देखते हो,  उन बूँदों का क्या जिनमें पानी नहीँ होता!

तुम्हारी हथेलियों की हिना

चित्र
 

एक बेटी की इच्छा

चित्र
  Image credit Dreamstime  चाहती हूं लौट जाना  मां की कोख में,  फ़िर एक बार , धरती पर आने का इंतज़ार करना चाहती हूं,  नौ माह देखना चाहती हूं पिता को मां के पेट पर हांथ फेरते हुए,  आंखों में लिए असीम प्रेम, माधुर्य के दिनों का एहसास,  मेरा आना हो सकता है चमत्कार,  टूटते रिश्तों में मधु बन उतर जाना चाहती हूं,   ग़र घूंट घूंट पिया जाय प्रेम,  तो जिंदगी भर ख़त्म न हो,  तलाक के काग़ज़ शायद उड़ जाएं खिड़की से बाहर,  जैसे फेंक दी जाती हैं अनचाही चीजें कबाड़ के साथ,  मां और पिता फ़िर साथ बैठ सपनों में खो जाएं  और मैं  उनके प्रेम की साक्षी बन स्थिर हो जाऊँ उन दीवारों की जगह। ।

लखनऊ

चित्र
  Image credit pinterest  तुम्हारी हथेलियों की हिना में मेरा नाम कुछ यूं खोया  मानो लखनऊ की भूल भुलैया में नीचे उतरना है कि ऊपर चढ़ना है समझ ना आया  मैं इमामबाड़े सा अपने आप को अकेला पाता रहा , तो कभी रूमी गेट के उस पार बड़ी देर तुम्हारे इंतजार में खड़ा रहा  तुम नीबू पार्क की दहलीज पर कुछ यूं मुस्कुराए मानो गोमती का किनारा तुम तक चल कर आ रहा हो और कहता हो कि मुझ में तुम यूं बसे हो जैसे बसी है तहज़ीब लखनऊ में। ।

प्रेम के सफर पर

चित्र
Image credit pinterest चलो एक सीढ़ी चढ़ें लंबी वाली; पकड़ एक दूसरे के हांथ, आसमान से झांकते चांद को छूने का भ्रम पालें, जैसे दोनो हाथों के बीच पकड़ लेते हैं 'ताजमहल' तस्वीर में,  आओ न, सहलायें  पत्तियों की पीठ,  गुलाब के कान में कहें अपनी बात , नदी के गीत पर मचलने दें घुँघरूओ को, कहें अलविदा जाते हुए लोगों को, रोका नहीं जा सकता जिन्हें,  प्रेम से ज्यादा प्रेम के किस्से कहे जाते हैं,   जैसे चाँद उतरता है आधी रात,  खण्डहर में घूमती आत्मा के पास , हम भी उतर आयेंगे जीवन की सतह पर  रोमांचक सफर से लौटना ही होता है  कहीँ न कहीँ ।। ©️अपर्णा बाजपेई