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उंगलियों का तिलिस्म

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 उतरन की तरह उतार कर रख दिया प्रेम, कमरे के भीतर उतार कर रख दी आत्मा, वह अभी भी सांकल पर रखी उँगलियों का तिलिस्म खोजती है, वे जो खोल देती हैं दरवाजे से दुनिया... सोलह श्रृंगारों का साथ, सुहागन की पहचान, वंश की बेल को जिंदा रखने का एहसास फिर भी उंगलियों का जादू जिस्म की सांकल नहीं खोल पाता, रूह और प्रेम के बिना भी बीत जाती है ज़िन्दगी, कट जाती है उमर बढ़ता है वंश भी  बस एक इंसान मात्र शरीर रह जाता है... Picture credit -Siddhant  #अपर्णा

बच्चे की भगवान से बात

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ईश्वर के वैभव को देखकर एक बच्चा भगवान से कुछ इस प्रकार बातें करता है..

प्रेम और शांति के बीच हम

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 किसे नहीं पसंद है रातों का मख़मली होना, सुबह के माथे पर उनींदी ओस की बूंदें, झुमके के साथ हिलते बालों का मचलना, वे इलाइची की गंध में पगी चाय की खुशबू खोजते हैं, जैसे तलाशते हैं अफ़ग़ान बच्चे शांति का एक कोना, जहां बंदूकों और बमों की आवाजें न हों, जब तालिबानी लड़ाकों की मासूमियत मर जाती है, तभी धरती से सूख जाती है शबनम! रात के आंचल पर बिखर जाता है मासूम तारों का लहू, क्यों न चाय के गिलास में पिला दी जाय शांति की दवा, हिंसक मंसूबों पर उड़ेल दिए जांय मासूम बच्चों के कहकहे, आओ! दुनिया के माथे पर एक बोसा दिया जाय और सोख लिया जाय सारा ज़हर.. फ़िर झुमके  के साथ झूमेंगे बाल भी, हम भी... झूमती हवाएँ #अपर्णा वाजपेयी

हँसती हई औरत

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उसे हँसना पसंद है इसलिए उसने चुना हँसना! तब भी, जब फेंक कर मारता है कोई जूता, या बंद कर देता है दरवाजों के पार, वह हँसती है, अपनी उधड़ी हुई खाल देखकर, नाभि के नीचे बहते लहू की धार देखकर भी, वह भूख में भी हँसती है, बलात्कार ये बाद भी उसे हंसी आती है, दर्द के भयानक आवेग को दबाकर भी वह हँसती है.. वह हँसती है क्योंकि सिर्फ हंसना ही हथियार है हंसना एक मात्र उपचार, हंसी एक मात्र दोस्त! और हँसता नहीं कोई उसे देखकर अब... #अपर्णा वाजपेयी

आदिवासी गलियों में घूमते हुए

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"अंतरराष्ट्रीय जनजातीय दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं" आज प्रस्तुत है एक कविता जिसमें झारखंड के आदिवासी गलियों में घूमते हुए, उनसे मिलते हुए जो महसूस हुआ उसे स्वर देने की कोशिश की है... यह वीडियो देखें, और अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत कराएं.. सादर

हाँथी का घाव

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 एक कहानी बच्चों और जानवरों की दोस्ती पर  खुद सुनें और अपने बच्चों को सुनाएं.. दोस्ती बेज़ुबान जानवरों से कितनी जरूरी है!! क्या हम ख़ुद की तरह उनका दर्द भी महसूस कर सकते हैं? अगर बचाये रखनी है मानवता इस धरती पर तो हमें अपने बच्चों में अभी से संवेदना के बीज रोपने होंगे..