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जनवरी, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

इंद्रधनुष

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इंद्रधनुष आसमान में ही नहीं उगता यह उगता है एक स्त्री के जीवन में भी  हर शाम खून के लाल-लाल आंसू  टपक पड़ते है  उसकी आँखों से;  जब खरीदकर अनचाहे ही  बिठा दी जाती कोठे पर बार बार  बिकने के लिए. इंद्रधनुष का नीला रंग  जब-तब कौंध जाता है  जब प्रकट करती है वह अपनी इच्छा  और बदले में मिलते हैं क्रोध के उपहार, कहते हैं बैगनी रंग औरतों की आज़ादी का प्रतीक है  देखिये कभी उसकी आँखों के नीचे उभरे हुए स्याह दाग  आज़ादी के मायने उसकी हर तड़प में सिमटे हुए मिलते हैं, इन्द्रधनुष का हरा रंग  उसकी कोख में तोड़ता है दम, सूख जाती है हरियाली, पता चलते ही भ्रूण मादा है नर नहीं  और......... बहा दिया जाता है बेवजह रक्त के साथ हर ताने के बाद बुझ जाता है उसके जीवन से  उल्लास का नारंगी रंग, समाज मीच लेता हैं आँख और औरत;  व्योम के आसमानी रंग सी  विस्तार पा जाती है अपनी कुर्बानियों में. बारिश के बाद आसमान में उगता है इन्द्रधनुष  और.........  ज़िंदगी से मिट जात...

पंखुड़ियां (एक अद्भुत कहानी संग्रह)

आपको यह ख़ुशख़बरी देते हुए असीम हर्ष हो रहा है कि प्राची डिजिटल पब्लिकेशन की ओर से देशभर के 24 लेखक एवं 24 कहानियां का आयोजन किया गया जिसे "पंखुड़ियाँ" नामक कहानी संग्रह के रूप में 24 जनवरी 2018 को ई-बुक के रूप में पाठकों के लिए ऑनलाइन देश और दुनियाभर के ई बुक स्टोर्स पर उपलब्ध कराया गया  है।  प्राची डिजिटल पब्लिकेशन का हार्दिक आभार मेरी कहानी को शामिल करने के लिए ।  अधिक जानकारी के लिए नीचे दिया  गया लिंक क्लिक करें - http://www.indibooks.in/p/pankhuriya-ebook.html http://www.indibooks.in/p/pankhuriya-ebook.html

अच्छे बच्चे

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अच्छे बच्चे रोते नहीं  न ही करते हैं जिद  भूख लगने पर माँगते नहीं खाना  ललचाई हुयी नज़रों से देखते नहीं भरी हुयी थाली।  अच्छे बच्चे कहना मानते हैं माँ-बाप का  फटे कम्बल में सो जाते हैं  ठिठुरते हुए पैर मोड़ कर.....   पार्टियों की पत्तलों से खोज लेते हैं अपना हिस्सा  छोटे भाई बहनों को खिलाते हैं पहले।  अच्छे बच्चे स्कूल नहीं जाते  भोर अँधेरे काम पर जाते हैं  कमाकर भरते हैं पेट परिवार का  खेलने की उम्र में सीख जाते हैं दुनियादारी।  अच्छे बच्चे बचपन में ही ओढ़ लेते हैं बुढ़ापा  खिलखिलाते नहीं, रोते नहीं, उड़ते नहीं  अच्छे बच्चे जन्म से ही बड़े हो जाते हैं  बन जाते हैं आदमी  अच्छे या बुरे  दुनिया जानती है! (Picture credit google)

होना- न होना

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उम्र भर तेरे इश्क की बाती जलाए  जोहता हूँ बाट आहट की, रुनझुन का राग कब से गायब है  पर्दे के उस पार तुम्हारी उँगलियों का स्पर्श ताज़ा है अब भी  तुम लापता हो अपनी तस्वीर से  ये जो माला टंगीहै न  कहती है तुम्हारी अनुपस्थिति की कथा  पर कमबख्त कान.......  सुनते ही नहीं बस एक बार आकर कह दो  कि तुम नहीं हो आस-पास  मान लूंगा मै. बस इतनी सी गुज़ारिश है  झटक दो मेरा हाँथ अपनी स्मृतियों से......  समेट लो अपनी ध्वनि तरंगे इस कोलाहल से  जो मेरे अन्दर बेचैन है तुम्हारा होना ही जिंदा है  न होना; जाने कब का मर गया! (image credit google) 

समय उनका है!

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वे हमारा सूरज अपनी जेबों में ठूंस लेते हैं  हम रात की तारीक घाटियों में ज़िंदगी तलाशते हैं, वे चमन की सारी खुशबुओं को अपने हम्माम में बंद कर लेते हैं  और हम....  सड़ांध में मुस्काने खोजते हैं, एक दिन जब भर जाएगा उनका पेट.....  वे उल्टियां करेंगे शानो-शौकत की  और हम उनकी उतरन अपनी तिजोरियों में बंद कर लेंगे, बाकी नहीं हैं दिन  और......... रातें भी ख़त्म! सुई की टिक-टिक उनके इशारों पर नाचती है, हम...... अपने समय  का इंतज़ार कर रहे हैं!!!!!! प्रक्षेपण न जाने कब हो जाए, बंद हो जाए रौशनी दर्शक दीर्घा में पसर जाए सन्नाटा आओ एक आवाज़ तलाशें मरघट में शायद चीत्कार के अर्थ बदल जाएँ। (Image credit google)

मुक्ति!

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प्रेम की कश्ती समन्दर ले चला है और ममता खोजती है छाँव अपनी अश्क सारे बन रहे अवलंब अपने दास्तां किसको सुनाये मोह बंधन. है अगर ये प्रीति सच्ची देह की तो तुम्हे हम रोक लेंगे मार्ग में ही हाथ थामे रूह से चलकर मिलेंगे और उसको सौंप देंगे प्रीति अपनी. लो संभालो नेह के बंधन रसीले हम हुए अब मुक्त इस स्थूल जग से ले चलो गन्तव्य तक अब साथ दो तुम थक गया हूँ मैं बहुत अब थम लो तुम. जग है मिथ्या, तन है मिथ्या और मिथ्या रीतियाँ सब सिर्फ सच्ची रूह है और उसकी खूबियाँ सब एक डगर जाती वंहा है सब है राही उस डगर के एक मंजिल , एक मकसद, एक ही रब है सभी के  छोड़ दो ये आपाधापी , उसकी डोरी थम लो अब  तोड़ कर सब अर्थ बंधन मुक्त हो कर सांस लो अब.   (image credit google)

चाय वाली सुबह! #Tea

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​ तुम्हारी आवाज़ में उगता है मेरा सूरज   चाय बनाते हुए जब गुनगुनाती हो भोर का गीत रात के कांटो से फूलों के गलीचों पर उतर आता हूं, उस फ़ानूसी कप में जब थमाती हो मुझे गर्मागर्म चाय.. मै.... जैसे लौट आता हूं भटकती राहों से, रात का सपना हो या दिवास्वप्न मशीनों के साथ जूझते वक्त में तुम्हारी चाय! मुझे ज़िंदगी सौंपती है, जुबां पर इसका स्वाद और तुम्हारी नज़रों की मिठास पोछ डालती है तल्ख एहसासों को, हर रोज......  एक और दिन मिलता है जीने के लिये, सुबह की ये चाय और तुम्हारा साथ.... ज़िंदगी बस इत्ती सी तो है. (image credit google )

ज़िंदा होने की कीमत

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प्रेम खुद से!

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प्रेम के बेतहाशा उफ़ान पर  उड़ जाती है परवाह! प्रेम खुद से ........  दे जाता है उपहार  खुद को पा लेने का प्रेम की राह आसान नहीं बंदिशें हैं,जिम्मेदारियां हैं नजरें हैं, सवाल हैं, संदेह हैं प्रेम ही ज़वाब है...  प्रेम सच्चा है तो आत्मविश्वास है  प्रेम उल्लास का राग है प्रेम ही अलाप है  प्रेम खुद की रूह का एकालाप है प्रेम खोल देता है दरवाजे बुलंदियों के  प्रेम की पदचाप; मधुर है पर है कठिन  अजीब है पर सच्ची है प्रेम की राह पर........ चलते चलें  इस भीड़ में ज़रा खुद को पाते चलें।   (Image credit google)

नदी बहती रहे!

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बहती हुयी नदी  अपने साथ लाती है संस्कृतियों की धार,  न जाने कितने संस्कारों की साक्ष्य बनती है, जीवन के हर कर्म में साथ साथ जीती है।  प्रेमी जोड़ों के ख़ूबसूरत एहसास  बहे चले आते हैं नदी के साथ......... कि  बस जाती है पूरी की पूरी सभ्यता... विकसित होती हैं परम्पराएं, नदी के पेट में सिर्फ पानी ही नहीं होता, दफ़न होते हैं न जाने कितने राज़ भी........  पहाड़ी साँझ का सूर्य भी बहा चला आता है, मैदानी बाजारों में काम तलाशता है; खोजता है जीवन की उम्मीद .....कि ज़िंदगी बहती रहे नदी के साथ. बड़ी -बड़ी चट्टानें पानी के साथ बहते हुए; भूल जाती हैं अपना शिलापन, हजारों मील के सफर में  गायब हो जाती है उनकी नुकीली धार, शिलाएं छोटे-छोटे चिकने पत्थर बन   नन्हे हांथों के खिलौने हो जाती हैं, मैदानी बच्चों के संग घर-घर घूमती हैं। नदी ही धार  कभी काटती है, कभी उखाड़ती है  तो कभी बसाती है....  भूख में ,प्यास में ,सृष्टि के विकास में  नदी ही सहारा है, बची रहेगी नदी तो बची रहेंगी सभ्यताएं, नालों में ...