चौधराइन का हुक्का (लघु कथा)
चौधरी का हुक्का.. क्या कहा जाय! सबके मुंह लगने को बेताब.. मगर चौधराइन जब देखो तब, दरवाजे की ओट में रख देती हैं कि कोई दरवाज़े के सामने से पार हुआ नहीं कि मियां बुला लेंगे और हुक्का तफ़री शुरू... चौधराइन अपनी दादी की आख़िरी निशानी के तौर पर मायके से लाई थी, तब से पूरे गांव का दुलारा बना हुआ है चौधराइन का हुक्का। अब ख़ुद भी अस्सी बरस की हो गईं हैं और चौधरी तो नब्बे पार कर रहे होंगे लेकिन हुक्के की लत न छूटी। Image credit pixabay हुक्का भी सबको पहचानता है, अब्दुल पठान हों या बंशीधर पंडित..उंगलियों का स्पर्श बखूबी जानता है. जनानी उंगलियों की छुअन तो हुक्के के भीतर का पानी भी समझ जाता है। एक दिन हुआ यूं कि रामरतन की दादी का हुक्का टूट गया और दादी के दिमाग की सारी गालियां रामरतन की दुलहिन पर न्योछावर हो गईं.. रामरतन को नया हुक्का लाने का आदेश हो गया.. अब उसी दिन उसी समय हुक्का कैसे आये.. राम रतन परेशान... न लाया तो दादी का खाना हज़म नहीं होगा और पूरा घर उनके पेट की गैस पुराण सुनते सुनते पागल हो जाएगा . राम रतन ने साईकिल निकाली और चल पड़...