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ख़त

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उजड़े हुए खतों ने आज फिर दस्तक दी,  चाँद शरमाया,  सिमटा,  लरज गया मात्र सरगोशी से  उफ़ान पर थे बादल,  बरसने को बेताब।  हवा ने थामा हाँथ,  ले गयी दूर.....  कहा!   यादों के सिरे थाम कर;  बहकाना गुनाह है.  खतों का क्या,  बिन पता होते हुए भी  पंहुच ही जाते हैं,  प्यार पंहुचा ही देते है प्रिय के पास,  जान शब्दों में नहीं, एहसासों में होती है, और ख़त........   एहसासों का शरीर।  (picture credit google)