नदी बहती रहे!
बहती हुयी नदी अपने साथ लाती है संस्कृतियों की धार, न जाने कितने संस्कारों की साक्ष्य बनती है, जीवन के हर कर्म में साथ साथ जीती है। प्रेमी जोड़ों के ख़ूबसूरत एहसास बहे चले आते हैं नदी के साथ......... कि बस जाती है पूरी की पूरी सभ्यता... विकसित होती हैं परम्पराएं, नदी के पेट में सिर्फ पानी ही नहीं होता, दफ़न होते हैं न जाने कितने राज़ भी........ पहाड़ी साँझ का सूर्य भी बहा चला आता है, मैदानी बाजारों में काम तलाशता है; खोजता है जीवन की उम्मीद .....कि ज़िंदगी बहती रहे नदी के साथ. बड़ी -बड़ी चट्टानें पानी के साथ बहते हुए; भूल जाती हैं अपना शिलापन, हजारों मील के सफर में गायब हो जाती है उनकी नुकीली धार, शिलाएं छोटे-छोटे चिकने पत्थर बन नन्हे हांथों के खिलौने हो जाती हैं, मैदानी बच्चों के संग घर-घर घूमती हैं। नदी ही धार कभी काटती है, कभी उखाड़ती है तो कभी बसाती है.... भूख में ,प्यास में ,सृष्टि के विकास में नदी ही सहारा है, बची रहेगी नदी तो बची रहेंगी सभ्यताएं, नालों में ...