मगर ये न कहना!

कहो तो बदल दूँ ये दुनिया की रस्में 

कहो तो सितारे जमीं पे ले आऊँ,

कहो तो धरा आसमाँ से मिला दूँ 

कहो तो बाज़ार घर में बिछा दूँ ।। 

मगर ये न कहना .. 

कि खाना पका दो , 

ये बर्तन ज़रा ठीक से तुम सजा दो 

मेरे साथ बैठ कुछ इस्तरी करा दो ,

सुबह की चाय तुम ही बना दो,


वैसे तो मै हूँ बहुत सेंसीटिव भी; 

मैं जेंडेर वकालत भी करता रहा हूँ 

मगर एक कप मुझसे उठती नहीं है 

मै दुनिया बदलने में आगे रहा हूँ ।।   


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