लखनऊ
Image credit pinterest तुम्हारी हथेलियों की हिना में मेरा नाम कुछ यूं खोया मानो लखनऊ की भूल भुलैया में नीचे उतरना है कि ऊपर चढ़ना है समझ ना आया मैं इमामबाड़े सा अपने आप को अकेला पाता रहा , तो कभी रूमी गेट के उस पार बड़ी देर तुम्हारे इंतजार में खड़ा रहा तुम नीबू पार्क की दहलीज पर कुछ यूं मुस्कुराए मानो गोमती का किनारा तुम तक चल कर आ रहा हो और कहता हो कि मुझ में तुम यूं बसे हो जैसे बसी है तहज़ीब लखनऊ में। ।