माउंटेन मैन' दशरथ मांझी (कविता)
प्रेम में पहाड़ खोदते हुए कितनी ही नदियां बही होंगी स्वेद की, धरती माँ के आंचल पर, टपका ही होगा लहू उंगलियों से, या फट गई होंगी बिवाइयां; प्रियतमा के रुनझुन पांवों का स्वप्न देखते हुए, प्रेम के नाम पर विकास की इबारत लिखते हुए, तुमने कहा था! प्रेम राह बनाता है.., मिटाता नहीं Image credit google ओ पहाड़ पुरुष, शिलाओं सा धैर्य धारण कर, तुमने ही जिया प्रेम का सच्चा अर्थ, बेहाल पथिकों के पांवों पर; अपने पसीने का मरहम लगाने तुम्हारे हाथों ने थामी थी कुदाल, गर्भ धारित स्त्रियों की व्यथा को महसूस तुमने जो राह बनाई, आज बच्चे उसी राह पर फुदकते हुए कहते हैं, ओ मांझी काका! तुम होते तो हम तुम्हारा मस्तक चूमते और कहते! हम भी बनेंगे 'माउंटेन मैन'