माँ बनना.... न बनना
लेबर रूम के बेड पर तड़पती हुई स्त्री जब देती है जन्म एक और जीव को तब वह मरकर एक बार फिर जन्म लेती है अपने ही तन में, अपने ही मन में, उसके अंतस में अचानक बहती है एक कोमल नदी जिसे वह समझती है धीरे धीरे; लेकिन दुनिया उस नदी की धार से हरिया जाती है, माँ बनना आसान नहीं होता और माँ न बनना.... उससे भी ज्यादा कठिन, सवालों और तिरछी नज़रों के जख़्म लेबरपेन से ज्यादा कष्टकारी होते है, कि दुनिया हर उस बात के लिए सवाल करती है जो आप नहीं होते... औरत के लिए माँ बनना न बनना उसकी च्वाइस है न कि उसकी शारीरिक बाध्यता. यदि न दे वो संतान को जन्म स्त्री का ममत्व मर तो नहीं जाता न ही सूख जाती है उसकी कोमल भावनाओं की अन्तःसलिला औरत जन्म से ही माँ होती है सिर्फ तन से नहीं मन से भी.. (Image credit Pixabay)