Thursday, May 17, 2018

माँ बनना.... न बनना

लेबर रूम के बेड पर तड़पती हुई स्त्री 
जब देती है जन्म एक और जीव को 
तब वह मरकर एक बार फिर जन्म लेती है
अपने ही तन में,
अपने ही मन में,
उसके अंतस में अचानक बहती है एक कोमल नदी
जिसे वह समझती है धीरे धीरे;
लेकिन दुनिया उस नदी की धार से 
हरिया जाती है,
माँ बनना आसान नहीं होता

और

माँ न बनना....
उससे भी ज्यादा कठिन,
सवालों और तिरछी नज़रों के जख़्म 
लेबरपेन से ज्यादा कष्टकारी होते है,
कि दुनिया हर उस बात के लिए सवाल करती है
जो आप नहीं होते...
औरत के लिए माँ बनना न बनना
उसकी च्वाइस है
न कि उसकी शारीरिक बाध्यता.
यदि न दे वो संतान को जन्म 
स्त्री का ममत्व मर तो नहीं जाता 
न ही सूख जाती है
उसकी कोमल भावनाओं की अन्तःसलिला
औरत जन्म से ही माँ होती है
सिर्फ तन से नहीं
मन से भी..

(Image credit Pixabay)





23 comments:

  1. वाह...
    जीवन का सच उकेर दिया
    सादर

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  2. आदरणीय दी, सराहना के लिए बहुत बहुत आभार आपका।
    सादर

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  3. बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण रचना।

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    1. मीना जी, बहुत बहुत आभार
      सादर

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  4. बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना अपर्णा जी।
    समाज का एक पूरा सच सामने है...एक औरत होने का दर्द शायद एक औरत ही समझ सकती है।

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    1. श्वेता जी, हृदयतल से आभार आपका
      सादर

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  5. सुंदर रचना
    माँ बनना या ना बनना एक स्त्री की मर्जी है.... उचित बात है.

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    1. रोहितास जी, सादर धन्यवाद

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  6. स्नेह और दर्द की अनुभूति का अच्छा तालमेल है।

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  7. बहुत सुंदर रचना अपर्णाजी

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    1. सादर आभार सुधीर जी, ब्लॉग पर आपका स्वागत है।
      सादर

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  8. सही है...

    शानदार अभिव्यक्ति...

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    1. कुशाल जी, ब्लॉग पर आपका स्वागत है। सादर आभार

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  9. औरत जन्म से ही माँ होती है तन से ही नहीं
    मन से भी....
    वाह!!
    बहुत सुन्दर सटीक...

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  10. औरत जन्म से ही माँ होती है
    सिर्फ तन से नहीं
    मन से भी..
    बेहद उम्दा सुंदर सटीक रचना
    भावपूर्ण हृदयस्पर्शी 👌

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    1. हृदयतल आभार आपका आँचल जी
      सादर

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  11. निमंत्रण

    विशेष : 'सोमवार' २१ मई २०१८ को 'लोकतंत्र' संवाद मंच अपने साप्ताहिक सोमवारीय अंक के लेखक परिचय श्रृंखला में आपका परिचय आदरणीय गोपेश मोहन जैसवाल जी से करवाने जा रहा है। अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/



    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

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  12. संवेदनात्मक अभिव्यक्ति ।

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    1. आदरणीय छगनलाल जी, ब्लॉग पर आपका स्वागत है। बहुत बहुत आभार।
      सादर

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  13. नारी मन नदी है ... धारा है कोमल हृदय है ... ज़रूरी नहीं उसे दिखाए अपनी ममता की कसौटी ...
    नारी मन को सजीव करती रचना ... बहुत सुंदर ...

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  14. बहुत सुंदर रचना

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  15. औरत जन्म से ही माँ होती है
    सिर्फ तन से नहीं
    मन से भी..
    बहुत ही लाजवाब रचना प्रिय अपर्णा -- सचमुच बचपन से ही माँ के अलग -० अलग रूप जीती है एक नारी | छोटे भाई बहनों के लिए वात्सल्य भाव -- बड़ों के लिए करुणा का प्रवाह भीतर ही बहता है | ममत्व के बिना उसका कोई रिश्ता कहाँ परिपूर्ण होता है |
    गहरी संवेदना जगाती रचना के लिए शुभकामनाये | सस्नेह --

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