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तुम बस थोड़ा जोर से हंसना

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 तुम बस थोड़ा जोर से हंसना  इतनी जोर से कि दिमाग में यह ख्याल रत्ती भर भी ना आए कि हंसने से आंखों के नीचे उभर आती हैं झुर्रियां , कि गालों पर उम्र की रेखाएं थोड़ी ज्यादा पैनी नज़र आती हैं ,  कि हंसने पर तुम्हारे दांत थोड़े पीले दिखते हैं , बस हंसना और महसूसना उस खुशी को जो हंसने में तुम्हें महसूस होती है , अपने चेहरे की बनावट, उम्र का असर और अनुभव की सुर्ख़ियों को कुछ देर के लिए भूल जाना , हंसना कि हंसने से रोशन होती है सारी फिज़ा , मिट जाता है गुबार, आसमान का रंग थोड़ा और नीला हो जाता है और धरती! थोड़ी और हरी।। ©अपर्णा बाजपेई 

आत्मबोध

  मेरे भीतर एक जादूगर रहता है न मुझसे जुदा , न मुझसा मुझे दूर से देखता हुआ दिखाता है मुझे आत्ममोह, या ख़ुदा! कितना अलग है मुझसे मेरा मै आत्मध्वजा के भार से झुका हुआ मै झुक ही नहीं पाता माफ़ी के दो लफ्ज़ो में, शुक्रिया के शब्दों का झूठ मेरी ही आत्मा पर जमा रहा कालिख है... न न .. अब और नहीं और नहीं लादूँगा खुद पर 'कुछ होने' का बोझ नहीं तो ..! मेरा जादूगर बदल देगा मुझे उस सुनहरी छड़ी में जिसकी छुअन से सच झूठ में बदल जाता है... #अपर्णा

नया इतिहास

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मेरी जेबों में तुम्हारा इतिहास पड़ा है कितना बेतरतीब था; तुम्हारा भूत..... वक्त की नब्ज़ पर हाँथ रख, पकड़ न पाया समाज का मर्ज़, मुगालते में ही रहा; कि... वक्त मेरी मुट्ठी में है, कानों में तेल डाल,  सुनता रहा, अपनी ही गौरव-गाथा! तब तक  झुका लिया मैंने, घड़ी की सुइयों को अपनी ओर, अब रचा जा रहा है नया इतिहास...... प्रेम के दस्तावेजों में नफ़रत नहीं अमन के गीत हैं सरहदों पर खून के धब्बे नहीं गुलाब की फसलें हैं,   शेष बहुत कुछ बचा है   इतिहास के पन्नों में जुड़ने को... जैसे नदी की कथा, हवा की व्यथा, खतों का दर्द, जुबां का फ़र्ज़,   शर्म का नकाब, गरीबों का असबाब, और भी बहुत कुछ बहुत कुछ बहुत कुछ...... तुम कुछ कहते नहीं!!!! इस इतिहास में तुम्हारी भी कथा होगी जो चाहो लिखना बस झूठे दंभ का आख्यान मत लिखना. (Image credit Pixabay.com)

माँ बनना.... न बनना

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लेबर रूम के बेड पर तड़पती हुई स्त्री  जब देती है जन्म एक और जीव को  तब वह मरकर एक बार फिर जन्म लेती है अपने ही तन में, अपने ही मन में, उसके अंतस में अचानक बहती है एक कोमल नदी जिसे वह समझती है धीरे धीरे; लेकिन दुनिया उस नदी की धार से  हरिया जाती है, माँ बनना आसान नहीं होता और माँ न बनना.... उससे भी ज्यादा कठिन, सवालों और तिरछी नज़रों के जख़्म  लेबरपेन से ज्यादा कष्टकारी होते है, कि दुनिया हर उस बात के लिए सवाल करती है जो आप नहीं होते... औरत के लिए माँ बनना न बनना उसकी च्वाइस है न कि उसकी शारीरिक बाध्यता. यदि न दे वो संतान को जन्म  स्त्री का ममत्व मर तो नहीं जाता  न ही सूख जाती है उसकी कोमल भावनाओं की अन्तःसलिला औरत जन्म से ही माँ होती है सिर्फ तन से नहीं मन से भी.. (Image credit Pixabay)

अच्छे बच्चे

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अच्छे बच्चे रोते नहीं  न ही करते हैं जिद  भूख लगने पर माँगते नहीं खाना  ललचाई हुयी नज़रों से देखते नहीं भरी हुयी थाली।  अच्छे बच्चे कहना मानते हैं माँ-बाप का  फटे कम्बल में सो जाते हैं  ठिठुरते हुए पैर मोड़ कर.....   पार्टियों की पत्तलों से खोज लेते हैं अपना हिस्सा  छोटे भाई बहनों को खिलाते हैं पहले।  अच्छे बच्चे स्कूल नहीं जाते  भोर अँधेरे काम पर जाते हैं  कमाकर भरते हैं पेट परिवार का  खेलने की उम्र में सीख जाते हैं दुनियादारी।  अच्छे बच्चे बचपन में ही ओढ़ लेते हैं बुढ़ापा  खिलखिलाते नहीं, रोते नहीं, उड़ते नहीं  अच्छे बच्चे जन्म से ही बड़े हो जाते हैं  बन जाते हैं आदमी  अच्छे या बुरे  दुनिया जानती है! (Picture credit google)

प्रेम का ताजमहल

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इस अरगनी पर  टंगी हैं तुम्हारी यादें …. हमारा प्रेम! न जाने कंहा निचुड़ गया, बसा है अब भी तुम्हारी साँसों का सोंधापन दीवारों पर तुम्हारे हांथों की छाप ज़िंदा है, हमारे प्रेम के अवशेष बिखरे हैं चंहु ओर...... कि.... ये कमरा हमारे प्रेम का ताजमहल है.

नए साल में खुशियों का चश्मा

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नया साल टकटकी लगाए झाँक रहा है कैलेण्डर से, जानता है महीने वही होंगे दिन भी.... बस उबासियों की हालत सुधर जायेगी. अम्मा का टूटा चश्मा शायद बदल जाए, बाबा की छड़ी की मूठ हो सकता है बना दी जाए नयी, गुड्डू को दिया जाय ताज़ा खाना शायद. अगले बरस, शायद कनस्तर में आंटा थोड़ा ज्यादा हो जाय. भूखे का पेट भर दिया जाय पूरा, पापा को चंद मिनट मिल जाएँ ज्यादा... अपने बच्चे की किलकारियां सुनने करने के लिए, नए साल में, सरहद पर खून के छींटे शायद कम गिरे, छोड़ दिए जांय बेक़सूर कैदी, सरकारी कार्यालयों में धूल फांकती फाइलें ले ही आयें घरों में उजास, न्याय की राह देखता मंगलू शायद पा ही जाए अपना हक़ .... नया बरस शायद खोज ही लाये सबकी खुशियों की चाभी! उम्मीद के बादल बरस रहे हैं मूसलाधार...... नए वर्ष में हवाओं का रुख बदल जाएगा या बदल जायेगा हमारा नज़रिया ही. (Picture credit google)

कटे हुए हाँथ

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कटे हुए हाँथ  मचलने लगते हैं कभी -कभी  सच को साबित करने के लिए. उतावले होकर कोशिश करते हैं  कानून का गला पकड़ने की. बार बार चीखते हैं, करते हैं नाद भरी सभा में, फिर भी झूठ का अट्टहास  बंद कर  देता है उनका मुंह, खुद से रिसते हुए लहू को  साक्ष्य  के तौर पर पेश करने के बावजूद  ज़िंदा नहीं माना जाता उन्हें, कटे हुए हांथ थाम लेते हैं मशाल; कभी - कभी हथियार भी,  अपनी बात कहने के लिए  हवा में भरते हैं उड़ान  चिढ़ाते हैं जुड़े हुए हांथों को  कि उनके पास  लालच की चूड़ियाँ नहीं होती। (Picture credit google)

कीमती है!

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अन्न धन है  अन्न मन है  अन्न से  जीवन सुगम है  अन्न थाली  अन्न बाली  अन्न बिन धरती है खाली  अन्न धर्म  है  अन्न मर्म है  अन्न ही सबका कर्म है   अन्न संस्कार है  अन्न बाज़ार है  अन्न ही सबका त्यौहार है  एक-एक दाने की कीमत  खुदकुशी और मौत है  भूख और बाज़ार  धर्म और संस्कार में  झोपड़ी और गोदाम में  अन्न खुशी का आधार है।   (Picture credit to Malay Ranjan Pradhan's FB wall)

बाकी है अब भी!

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जब- जब तुम्हे मिलने निकलती हूँ बादलों के मेलें में गुम हो जाती हूँ तुम, चाँद बन इठलाते हो, खेलते हो छुपंछुपाई हवा के झूलों पर उड़ती हूँ दौड़ती हूँ तुम्हे छूने को  हज़ार कोशिशें करती हूँ  और तुम! भागते हो मुझसे दूर अमावस की चादर तले छुपते हो  निहारते हो चोरी- चोरी मेरे एहसास में गुम हो तुम भी  फिर; ये कैसा खेल? बाकी है अब भी  प्रेम का प्रकटीकरण।।।।   (picture- google)

टहनियों की पंहुच

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उसके साथ आलिंगनबद्ध होने पर भी, खींच ही लाती हैं मेरी टहनियां तुम्हे और वो तकती है मेरी राह कि कब पंहुचेगे मेरे हाथ उसके तने तक जानती नहीं परजीवी हूँ  जीती हूं तुम्हारा ही रस पीकर तुम्ही से है मेराअस्तित्व और वो! धरा है तुम्हारा आधार छोड़ नहीं सकते उसे और मुझे भी तुम उससे जीते हो और मै तुमसे. (image credit google)