लंच बाक्स से झांकता है समाजवाद
बच्चों के लंच बाक्स से झांकता है समाजवाद, कि कुछ डिब्बों में रखी होती हैं करारी- कुप्पा तली हुयी पूरियां और कंही, चुपके से झांकती है तेल चुपड़ी तुड़ी-मुड़ी रोटी, कुछ बच्चे खाते हैं चटखारे लेकर-लेकर बासी रोटी की कतरने, तो कुछ; देशी घी में पगे हलवे को भी देखकर लेते हैं ऊब की उबासी, ये सिर्फ लंच बाक्स नहीं हैं ज़नाब! ये हैं उनकी बाप की कमाई का पारदर्शी नक़ाब, माँ की सुघड़ता का नमूना, और कुक की नौकरी कर रही माओं की मजबूरी लिखी स्लेट; जो दूसरों के टिफिन को लज़ीज़ पकवानों से सजाने से पहले, जल्दी-जल्दी ढून्सती हैं अपने बच्चों के टिफिन में रात के बचे चावलों को बिरयानी की शक्ल में; और करती हैं मनुहार, प्यार से खाली कर देना डब्बा; वरना मेरी आत्मगलानि मुझे जीने नहीं देगी।