कहो कालिदास, आज दिन भर क्या किया, धूप में खड़े खड़े पीले तो नहीं पड़े, गंगा यमुना बहती रही स्वेद की और तुम.... उफ़ भी नहीं करते , कहो कालिदास, कैसा लगा मालविका की नज़रों से विलग होकर, तुम लौट-लौट कर आते रहे उसी दहलीज़ पर मन में कौंधती रही दाड़िम दंतपंक्ति मुस्कुराहटें संभालते रहे प्रेम की पोटली में लौट नहीं पाते उसी द्वार खुद से वादा..... प्रेम से ज्यादा जरूरी है? कहो कालिदास, विद्वता की गरिमा ओढ़ थके तो नहीं, इससे तो अच्छा था कि बैठे रहते उसी डाल पर जिसे काट रहे थे, गिरते तो गिरते, मरते तो मरते, जो होना था हो जाता महानता का बोझ तो न ढोना पड़ता, अरे कालिदास! महानता की दहलीज़ के बाहर आओ, ज़रा मुस्कुराओ, कुछ बेवकूफियां करो कुछ नादानियाँ करो, बौद्धिकता का खोल उतारो हंसो खुल के जियो खुल के, अरे कालिदास! एक बार तो जी लो अपनी ज़िंदगी। (हर पुरुष के भीतर बैठे कालिदास को समर्पित) (Image credit Shutterstock)