मृत्यु से पहले की उम्मीद ( #Road Accident)
दूर हूँ बहुत उनसे ,तुमसे ,खुद से, अपनी ही साँसे पता नहीं चल रहीं, नहीं मालूम दिल धड़क भी रहा है या नहीं, जानता हूँ, ज़िंदा हूँ अभी लहू- लुहान पड़ा हूँ आँखें बंद, होंठ खामोश प्यास का लहलहाता समंदर बस जीने की तड़प है बाकी है, न जाने कौन आयेगा सड़क के इस पार, बचाएगा मुझे; या मुंह फेर चला जाएगा अपनी राह, जैसे मैं गुज़र जाता था सड़क पर पड़े घायलों को देख, जानता हूँ व्यस्त हैं सब, मर गयी है सम्वेदना, फिर भी है उम्मीद........ कोई न कोई बचा ही लेगा ज़िंदा होगा इंसान किसी न किसी शरीर में जरूर... और अगर न बचाए कोइ मुझे; हे इश्वर! ये उम्मीद बचाए रखना कि ज़िंदा है इंसानियत इंसान के भीतर। (Image credit google)