संदेश

स्त्री विमर्श लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

तुम बस थोड़ा जोर से हंसना

चित्र
 तुम बस थोड़ा जोर से हंसना  इतनी जोर से कि दिमाग में यह ख्याल रत्ती भर भी ना आए कि हंसने से आंखों के नीचे उभर आती हैं झुर्रियां , कि गालों पर उम्र की रेखाएं थोड़ी ज्यादा पैनी नज़र आती हैं ,  कि हंसने पर तुम्हारे दांत थोड़े पीले दिखते हैं , बस हंसना और महसूसना उस खुशी को जो हंसने में तुम्हें महसूस होती है , अपने चेहरे की बनावट, उम्र का असर और अनुभव की सुर्ख़ियों को कुछ देर के लिए भूल जाना , हंसना कि हंसने से रोशन होती है सारी फिज़ा , मिट जाता है गुबार, आसमान का रंग थोड़ा और नीला हो जाता है और धरती! थोड़ी और हरी।। ©अपर्णा बाजपेई 

झूठे बाज़ार में औरत

चित्र
एक पूरा युग अपने भीतर जी रही है स्त्री, कहती है ख़ुद को नासमझ, उगाह नहीं पायी अब तक अपनी अस्मिता का मूल्य, मीडिया की बनाई छवि में घुट-घुट कर होंठ सी लेती है स्त्री, सड़कों पर कैंडल मार्च करती भीड़ में असली भेड़ियों को पहचान लेती है स्त्री  चुप है, कि उसके नाम पर  उगाहे जा रहे हैं प्रशस्ति पत्र, रुपयों की गठरियाँ सरकाई जा रही हैं गोदामों में, स्त्री विमर्श के नाम पर झूठ के पुलिंदों का अम्बार लग रहा है, लोग खुश हैं! कि रची जा रही है  स्त्री की नई तस्वीर, खोजती हूँ कि इस तस्वीर से  आम औरत ग़ायब है? (Image credit google)

इंद्रधनुष

चित्र
इंद्रधनुष आसमान में ही नहीं उगता यह उगता है एक स्त्री के जीवन में भी  हर शाम खून के लाल-लाल आंसू  टपक पड़ते है  उसकी आँखों से;  जब खरीदकर अनचाहे ही  बिठा दी जाती कोठे पर बार बार  बिकने के लिए. इंद्रधनुष का नीला रंग  जब-तब कौंध जाता है  जब प्रकट करती है वह अपनी इच्छा  और बदले में मिलते हैं क्रोध के उपहार, कहते हैं बैगनी रंग औरतों की आज़ादी का प्रतीक है  देखिये कभी उसकी आँखों के नीचे उभरे हुए स्याह दाग  आज़ादी के मायने उसकी हर तड़प में सिमटे हुए मिलते हैं, इन्द्रधनुष का हरा रंग  उसकी कोख में तोड़ता है दम, सूख जाती है हरियाली, पता चलते ही भ्रूण मादा है नर नहीं  और......... बहा दिया जाता है बेवजह रक्त के साथ हर ताने के बाद बुझ जाता है उसके जीवन से  उल्लास का नारंगी रंग, समाज मीच लेता हैं आँख और औरत;  व्योम के आसमानी रंग सी  विस्तार पा जाती है अपनी कुर्बानियों में. बारिश के बाद आसमान में उगता है इन्द्रधनुष  और.........  ज़िंदगी से मिट जात...