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मांग का मौसम

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प्रेम की मूसलाधार बारिश से ,  हर बार बचा ले जाती है खुद को , वो तन्हा है....... .  है प्रेम की पीड़ा से सराबोर , नहीं बचा है एक भी अंग इस दर्द से आज़ाद. जब-जब बहारों का मौसम आता है , वो ज़र्द पत्ते तलाशती है खुद के भीतर , हरियाले सावन में अपना पीला चेहरा... छुपा ले जाती है बादलों की ओट , कहीं बरस न पड़े..... उसके अंतस का भादौं ; पलकों की कोर से. जिया था उसने भी कभी..... हर मौसम भरपूर. मांग में ; पतझड़ का बसेरा हुआ जब से , सूख गयी है वो.... जेठ के दोपहर सी ; कि अब , बस एक ही मौसम बचा है उसके आस-पास वैधव्य का......