नया इतिहास
मेरी जेबों में तुम्हारा इतिहास पड़ा है कितना बेतरतीब था; तुम्हारा भूत..... वक्त की नब्ज़ पर हाँथ रख, पकड़ न पाया समाज का मर्ज़, मुगालते में ही रहा; कि... वक्त मेरी मुट्ठी में है, कानों में तेल डाल, सुनता रहा, अपनी ही गौरव-गाथा! तब तक झुका लिया मैंने, घड़ी की सुइयों को अपनी ओर, अब रचा जा रहा है नया इतिहास...... प्रेम के दस्तावेजों में नफ़रत नहीं अमन के गीत हैं सरहदों पर खून के धब्बे नहीं गुलाब की फसलें हैं, शेष बहुत कुछ बचा है इतिहास के पन्नों में जुड़ने को... जैसे नदी की कथा, हवा की व्यथा, खतों का दर्द, जुबां का फ़र्ज़, शर्म का नकाब, गरीबों का असबाब, और भी बहुत कुछ बहुत कुछ बहुत कुछ...... तुम कुछ कहते नहीं!!!! इस इतिहास में तुम्हारी भी कथा होगी जो चाहो लिखना बस झूठे दंभ का आख्यान मत लिखना. (Image credit Pixabay.com)