प्रेम की उतरन
अंजुरी में तुम्हारी यादों का दिया जला पढ़ता रहा हमारी अनलिखी किताब. हमारा साथ अंकित था हर पृष्ठ पर, हमारा झगड़ा और वो अनोखी सुलह..... जब तुमने हमारे रिश्ते के लिए बाज़ार की शर्त लगा दी....... और मै! कांपता ही रहा अनोखे डर से. मेरी हंथेली में तुम्हारी रेखा नहीं थी और तुम .... नसीब पर ऐतबार कर रही थी. चाहा था मैंने भी उतना ही जितना तुमने; साथ हमारा खिले सुर्ख गुलाब सा। सूखे गुलाबों की पंखुड़ियां महकती हैं अब भी, उड़ते हैं मोरपंख, गौरैया का घर टंगा है अब भी वंही, स्वप्नों की कतरने सजी हैं दीवारों पर, तुम भी हो, मै भी हूँ, बस हमारा रिश्ता बाज़ार में बिक गया । (Picture credit google )