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अविवाहिता

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  गेसुओं में खिले गुलाब तरोताज़ा थे  उन हांथों के स्पर्श से भोर में जो रख देते थे माथे पर एक मीठा चुम्बन, उसने नहीं देखा था सुबह का सूरज कभी,  माँ के चरणों से छनती स्नेह-धूप हजार सूरजों पर भारी थी... चाय की कप के लिए मधुर पुकार ने उसे इश्क़ के समंदर से खींच लिया था... उम्र के ज्वर से कांपते शरीर अम्बर में टंके चाँद से ज्यादा कीमती थे... कुबूल है बोलने की जगह कुबूला था उसने जन्मदाता के लिए नरम छांव बनना उम्र की जमा पूंजी चन्द स्मृतियाँ थी; जो मृत्यु की राह तक सहचर हुईं... picture credit  @siddhant अपर्णा बाजपेयी