Saturday, January 30, 2021

असलियत का सामना( किस्सा बालों का)

फैशन करना किसे अच्छा नहीं लगता! खूबसूरत बाल, चमकदार आंखें,  उजली रंगत, खशबू उड़ाती अदा और न जाने क्या क्या...
तो दोस्तों मारे तो हम सब हैं फैशन के...

कभी कभी हम खुद को थोड़ा अलग दिखाना चाहते हैं... और इसके लिए भारी मशक्कत भी करते है. लेकिन क्या हो अगर भरे बाज़ार हमारा असली रूप सामने आ जाये।
तो किस्सा कुछ यूं है कि,

अरशद मियाँ क्या गबरू जवान हट्टे-कट्टे आदमी थे एक बार में चार आदमियों को धूल चटा देने वाले... मोहल्ले में उनके जैसा दिखने वाला दूसरा आदमी न था। घर में बूढ़े बाप के अलावा और कोई न था। बेचारे जल्द से जल्द शादी करना चाहते थे। खाला और फूफियों ने कई रिश्ते भी दिखाए थे पर बात बन न पाई थी। समस्या थी उनके बाल! जो दिनों दिन संख्या में कम होते जा रहे थे। अब टकला होना किसे अच्छा लगता है... बेचारे हर महीने हज़ारों रुपये अपने बालों को बचाने में खर्च करते। गूगल बाबा की शरण में जा-जा कर नए नए नुस्ख़े तलाशते और उन्हें अपने  बालों पर आजमाते, पर वही ढाक के तीन पात!! बालों का गिरना बदस्तूर जारी था।
एक दिन ख़ाला ने कहा कि एक खूबसूरत लड़की मिल गई है... जल्द से जल्द आकर देख लो नहीं तो वह भी हाँथ से निकल जायेगी। मियां मौका कैसे छोड़ते... पर बालों का क्या करें? समस्या जस की तस थी... आगे का सिर लगभग साफ़ ही चुका था और पीछे भी लगभल मैदान खाली ही था। हां दोनो कानों पर कुछ अम्पायर उंगली उठाये खड़े थे। अरशद मियां मन ही मन आउट हो ही चुके थे... 
मन की आस! कुछ तो करना ही था आख़िर कब तक कुंवारे बैठे रहते। हिम्मत करके एक नकली बालों वाली दुकान में पहुंचे। आह क्या खूबसूरत हसीनाएं अपनी जुल्फ़े लहराती हुई चारों तरफ़ घूम रही थी। तभी एक खूबसूरत आवाज़ ने उन्हें अपने पास और बुलाया और बोली, बताइये ज़नाब क्या ख़िदमत कर सकती हूँ आपकी और उसने एक झटका दिया अपने माथे पर आते बालों को... ख़ुशबू का तेज झोंका अरशद मियां को जैसे जन्नत तक उड़ा कर ले गया हो। चेहरे पर नज़र ऐसी गड़ी कि हटने का नाम नहीं ले रही थी।लडक़ी ने थोड़ी देर तो राह देखी कि मियां जमीन पर वापस आ जाएं लेकिन मियां जहां अटके थे लग रहा था कि गाजे-बाजे के साथ ही लौटेंगे। लडक़ी ने उनके कंधों को बुरी तरह से झिंझोड़ते हुए उन्हें जमीन पर ला पटका और बोली, आपको कुछ लेना है तो बोलिये नहीं तो सिक्योरिटी को बुलाऊँ! अरशद मियां हड़बड़ाकर बोले मोहतरमा," इस गंजे हो रहे सिर के लिए एक अदद विग की जरूरत है. अगर आप कुछ मदद कर सकें तो बड़ी मेहरबानी होगी'. जी मिस्टर क्यों नहीं आइये आप मेल सेक्सन की तरफ़ आइये।  मेल सेक्सन में पंहुचते ही अरशद किया को जैसे मुंह मागी मुराद मिल गई हो। ऐसे- ऐसे बाल कि नज़र न हटे। लाल, पीले, सुनहरे, काले, बरगंडी, भूरे , सफ़ेद अलग अलग रंगों वाले बेहतरीन कटिंग वाले बालों की ऐसी विग कि असली बाल भी उन्हें देखकर शरमा जाएं। कई सारी विग उन्होंने ट्राई की। खुद से ज्यादा उस लड़की की नज़र पर उन्हें भरोसा था। आख़िर विग लगाकर एक लड़की को देखने जो जाना था। अंत में मियां को काले और भूरे रंग के बालों वाली विग पसन्द आई जो वास्तव में  अमिताभ बच्चन के हेयर स्टाइल से मिलती जुलती थी।
मियां घर पहुंचे... बालों का मसला लगभग हल हो चुका था।
अगले दिन मौसी और अब्बा के साथ लड़की वालों के घर पहुंचे यह सोचकर कि सब कुछ ठीक ठीक रहा तो आज ही निकाह पढ़वा लेंगे। काज़ी भी साथ था। मियां ने लड़की को देखा और लड़की उन्हें पसंद आ गई थी। लड़की को भी वे पसंद थे । घर वालों ने जल्द से जल्द शादी का फैसला किया। लड़की जैसे ही उठी सबसे गले मिलने के लिए, मियां अरशद भी उठ खड़े हुए अब्बा और अन्य लोगों से मिलने के लिए,अचानक उनका सिर लड़की से टकरा गया और लड़की काजी के ऊपर धड़ाम से गिरी। इस हड़बड़ी में अरशद मियां की विग वहीं पर गिर गई ।अब विग तो गिरी और साथ में मियां के सारे अरमान भी वहीं ढेर हो गए। विग के साथ इज्जत भी गिर गई थी । सारे बाल नीचे आ चुके थे। फैशन और झूठ ने अपना रंग दिखा दिया था।
 लड़की वालों को बहुत समझाया बुझाया लेकिन लड़की वाले थे कि मानने को तैयार नहीं थे। पहले ही साफ़ बता देते कि सिर गंजा है... आखिर बाल ही तो गये थे.. झूठ बोलने और नकली बाल लगाने की क्या जरूरत थी!
झूठ ने रिश्ता तोड़ा, गंजा सिर लिए मियां अब नकली बालों का कारोबार कर रहे है ... उनका न सही किसी और का रिश्ता ही हो जाये शायद!



  




Wednesday, January 27, 2021

धागे का दु:ख


मजदूर के तन पर चढ़ा उतरन
खुशी में भूल जाता है अम्मा की उंगलियों का स्वाद,
करघा खड़ा है गांव के बाहर
कपास सिर धुन रही है मिल की तिजोरी में,
का से कहूं दुखवा मैं धागे का,
मिलान में रेड कार्पेट पर चलती हसीनाएं और उनका शरीर
न जाने आजकल गंध क्यों मारते हैं,
बाबू के माथे का पसीना
जब - जब गिरा है करघे की डोरों पर,
यह देश मेहनत की खुशबू में डूब गया है।

©️अपर्णा बाजपेई

Sunday, January 24, 2021

यह गणतंत्र दिवस हमारे कर्तव्यों के नाम


गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ आइए आज हम प्रण लेते हैं कि यह दिन हम अपने जीवन में मात्र एक छुट्टी के दिन की तरह न मनाकर याद करेंगे आज़ादी के उन लड़ाकों की कहानी जिन्होंने अपने आप को हंसते हंसते देश पर न्योछावर कर दिया था।

आज सबसे जरूरी है कि हम अपने बच्चों को इस आज़ादी की कीमत समझाएं, उन्हें बताएं इस प्रजातंत्र ने उन्हें क्या शक्ति दी है, हमारे संविधान ने उन्हें क्या अधिकार दिए हैं और उनके क्या कर्तव्य हैं।

आज जब पर्यावरण बिगड़ रहा है, जंगल सिकुड़ रहे है, इंसान मात्र एक संख्या भर है तब जरूरत है कि हम बच्चों को सही राह दिखाएं, उनके लिए प्रेरणा बनें।

इस गणतंत्र दिवस को प्रकृति और मानवता के नाम समर्पित करें।


Wednesday, January 20, 2021

झरबेरिया के बेर

 आज झरबेरिया का किस्सा सुनो दोस्तों!

तो हुआ यूं कि एक दिन राम खेलावन चच्चा बैठे रहे अपने दुआर पर। तब तक पियरिया अपनी झोरी में झड़बेरी के बेर लेकर खाते हुए निकली और राम खेलावन के दरवाज़े के बाहर गुठली थूक दी। राम खेलावन सब देख रहे थे। वहीं से चिल्लाए... ऐ पियारी एने आओ... उठाओ गुठली, दरवाज़े दरवाजे थूकती चलती है। पीयारी सहम गई... ई राम खेलावन चच्चा कहां से देख लिए.. अब हो गया सत्यानाश..

पियारी लौट के अाई का ,हुआ चच्चा... आवाज़ दिए थे का...

चच्चा का पारा सातवें आसमान पर..

देखो इसको.. दरवाजे पर गुठली थूक के कहती है आवाज़ दिए थे का.. ई गुठली उठाओ और भागो यहां से.. पियारी लजा गई। चच्चा आज नहीं छोड़ेंगे। दुवार पर गिरे एक- एक पत्ता को अपनी जेब में रखने वाले राम खेलावन आज दरवाजे पर किसी का थूक कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं। बात सही है चच्चा की। तब तक मोहल्ला के और लोग इकट्ठा हो गए।

 अपनी ही थूकी हुई गुठली उठाने में पियारी को बहुत शर्म अा रही थी वो भी सबके सामने। झट से चच्चा के सामने झोली फैलाते हुए बोली, चच्चा तनी खाके देखो ई बेर। हिया खटिया पर रख रहे हैं, अभी गुठली उठा के फेंक देंगे। तनी मिठास देखो बेर की। ऐसे झरबेरिया के बेर पूरे चौहद्दी में नहीं है । 

लाल, पीले, गुलाबी बेर देख के चच्चा की आंखों में जो चमक अाई की दुवार पर का थूक भूल गए। चच्चा ख़ाके के देखो, खाने के लिए पियारी जोर देने लगी। खट्ठे, मीठे बेर देख के किसका हांथ रुकता है। इकट्ठा भीड़ भी एक एक बेर उठाने लगी और चच्चा तो जैसे टूट पड़े। 

दुवार और गुठली सब भूल गए। पियारी मौका देख के  निकल ली। बोली, चच्चा  बेर खाइए हम अभी अा रहे हैं। वहां इकट्ठा भीड़ ने भी बेर खाए और गुठली वहीं थूकी। 

पियारी़ जा चुकी थी और बेर तोड़ने और राम खेलावन चच्चा झाड़ू लिए दुवार साफ कर रहे थे। 

 चच्चा सोच रहे थे सच में मति मार देते हैं ये झरबेरी के बेर...

अबकी आने दो पियारी को पूरा दुवार न साफ़ कराया तो कहना!

©️ अपर्णा बाजपेई

Image credit Google







Wednesday, January 13, 2021

नया कुछ रचना है

पानी में रहना है
मगर से लड़ना है
किस्सों की दुनिया में
नया कुछ रचना है।

होशियार से होशियारी की
लोहार से लोहे की
पेड़ों से लकड़ी की
शिकायत नहीं करते हैं।

आंखों से पानी को
भरे घर से नानी को
बैलों से सानी को
अलग नहीं करते हैं।

बातों में मिठास को
दावत में लिबास को
बीमारी में उपवास को 

दरकिनार नहीं करते हैं।।


©️ अपर्णा बाजपेई

Thursday, January 7, 2021

वक्त से उम्मीद कुछ ज्यादा रही थी

 वक्त से उम्मीद कुछ ज्यादा रही थी,
आज एक सरिता कहीं उल्टा बही थी
रुक गए थे हांथ में पतवार लेकर
मौज से कस्ती ने कुछ बातें कही थीं...


था अंधेरा हांथ में दीपक रखा था,
शाम ने जुगनू से एक मुक्त्तक कहा था,
धूप ने सींची थी वे कंपित गुफ़ाएं,
तम ने जिनमें मौन का संबल रखा था...

दोस्ती ने हांथ में खंजर रखा था,
पीठ पीछे शब्द ने गड्ढा बुना था
हांथ अपना कट चुका था बरसों पहले
देर से कितना कोई नश्तर चुभा था।

राह रोके खड़ी थीं कुछ वर्जनाएं
देहरी से दीप कुछ पीछे हटा था
लौटना था जिस तरफ हरदम अकेले
हांथ वहीं आकर सहसा कटा था

लौट आना फिर कभी कोई न बोला
ये जगह बस आपकी होकर रहेगी
स्वप्न सारे जीते होंगे जो कहानी
आज जाग्रत देह जिएगी दीवाली।।

©️Aparna Bajpai




जल है तो कल है

 सुनें एक कहानी और खोजें पानी बचाने के नए नए तरीके