Friday, April 16, 2021

जल है तो कल है

 सुनें एक कहानी और खोजें पानी बचाने के नए नए तरीके



Sunday, March 28, 2021

रंगों का उत्सव

 फागुन में रंगों की आई बाहर है,

गले मिलो होली ये सबका त्योहार है।2


हिन्दू और मुस्लिम सिक्ख ईसाई,

मिलजुल के सबने है होली मनाई

सबके गालों पर लगा अब गुलाल है

गले मिलो होली.....


फाग के रंग में रंगी है अवधिया,

कान्हा के गोकुल में नाचे हैं सखियां,

बरसाने  लाठी से होता दुलार है

गले मिलो होली ....


काशी में शिव की बारात है आई

भांग के रंग में रंगे हैं बाराती,

गौरा और शिव की निराली ही बात है

गले मिलो होली......


रंगों का उत्सव खुशी का है संगम

शालीन रखना, मचाना न ऊधम,

हुड़दंगी होली से बचना ही शान है

गले मिलो होली....



Wednesday, March 24, 2021

शहीदों को याद करते हुए


फाँसी का फंदा चूम लिया

जब तीनो अमर शहीदों ने

वो बीज धरा पर डाल गए

कुर्बानी की परिपाटी के,


था एक भगत, एक राजगुरू

सुखदेव एक था तीनों में,

उस कोर्टरूम में बस उसदिन

बम धमकाने को फेंका था,


उद्देश्य एक था आज़ादी

अंग्रेजों को भगाना था,

अपने अम्बर की छाती पर

आज़ाद हवा लहराना था,


सूखी रोटी सादा पानी,

अपनी धरती का सुख धानी,

आज़ाद देश का मूल्य बहुत

कुछ वीरों की हो कुर्बानी,


भारत माता की सेवा में 

घर बार जिन्होंने छोड़ा था

कर न्योछावर सुख जीवन का

अपनों को सिसकता छोड़ा था,


न कोई लालच था उनको,

उत्कृष्ट इरादा था उनका

बस देश प्रेम ,आज़ाद फिज़ां

सब वीरों का बस एक सपना


अंतिम इच्छा थी तीनों की,

बस एकदूजे के गले मिले

फ़िर चूमें वे इस फंदे को

माँ के मस्तक को ज्यों चूमें,


था सिसक रहा पूरा भारत

और देशप्रेम की अलख जगी

कुर्बान हुए उन वीरों से

अगणित वीरों की फौज उठी,


फ़िर फहर गया अपना झंडा,

अंग्रेजों से आज़ाद हुए,

उन अमर शहीदों ने हमको

आज़ादी की सौगात दिए,


इस आज़ादी को जीना है

इस धरती पर मर मिटना है,

हो जन्मभूमि पर न्योछावर

अपनी आहुति अब देना है।।



©️अपर्णा बाजपेयी

Monday, March 22, 2021

शहीदों की याद में

 इस शहीद दिवस पर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को इस छोटी सी कविता के माध्यम से हम श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं



Sunday, March 21, 2021

प्रेम में

 उन्होंने मछलियों से प्रेम किया
खींच लाये उन्हें पानी से बाहर,
भले ही इस बीच वे ज़िंदा से मृत हो चुकी थीं;
पानी जो उनका लिबास था
घर था और था जिंदगी की पहली जरूरत,
प्रेम में पानी को पत्थर बनते देखा,
पानी जो गवाह था मरती हुई मछली की तड़प का,
मछलियां मर रही थीं
पानी मर रहा था,
ज़िंदा था तो बस प्रेम!
मनुष्य का प्रेम
मृत्यु का सबसे बड़ा सहोदर है।


Image credit undplash.com 

©️Aparna Bajpai

Tuesday, March 16, 2021

एक अज़नबी

 
तुमने मेरी आँखों मे देर तक झाँका,
चुपके से देखते, और छिप जाते शर्म की ओट,
मां की गोद में दुबके हुए तुम!
मेरे चेहरे की लकीरें पढ़ने में व्यस्त थे,
और मैं; तुम्हारी आंखों के उस भाव को समझने में,
तुमने मेरे बैग को छुआ, मानो जांचना हो मेरा गुस्सा,
मेरी ओढ़नी पर अपने होंठों की छाप लगाई,
शब्द हमारे बीच अज़नबी रहे, और भाषा अनावश्यक
फ़िर मैं उठी, विदा में तुम्हारी ओर देखा,
अचानक तुमने थाम ली मेरी उंगली....
तुम्हारी आँखों में भर आया जल, 
और मैं नेह के सागर में डूब गई...
अब तुम मेरी डायरी के पन्ने पर बैठे हो,
जैसे बैठ गया हो समय थोड़ी देर सुस्ताने को।

अपर्णा बाजपेयी

Sunday, March 7, 2021

जब कभी होना अकेले

 हम मनाते हैं 'अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस' क्योंकि महिलाओं को खुद से प्यार था। श्रम के मूल्य में बराबरी, सत्ता के चुनाव का अधिकार और समाज में स्वयं को समान स्तर पर लाने की चाह ही थी जिसने हमें लंबे संघर्ष के बाद अपना दिन दिया। यह दिन हम सब के लिए अपना होना चाहिए। सिर्फ महिलाएं ही नहीं पुरुषों के लिए भी। आज बस इतना कहना है कि हमें ख़ुद से प्रेम करना होगा तभी हम स्वयं को बराबरी के स्तर पर देख पाएंगे।


जब कभी अकेले होना

तो होना आने साथ,

दुलारना खुद को थोड़ा सा,
जैसे चूम लेते हो अपने बच्चे का मस्तक;
एक चुम्बन अपनी हथेलियों पर रखना

अपनी आंखों में झांकना और देखना
मानो नीली झील तुम्हारे मन में ठहर गई है,
एक लंबी सांस लेना और भर लेना हवा को फेफड़ों में,

पांवो के तलवों को छूकर कहना धन्यवाद दोस्त!
तुम्ही ने थाम रखा है इस कठिन समय में,
अपने अंगों को गौर से देखना और महसूसना;
कितनाअमीर बना कर भेजा है ख़ुदा ने तुम्हें,

दूसरों के ख़याल में डूबी हुई औरतों!
थोड़ी देर के लिए खुद के साथ होना,

और दुनिया भर के बोझ से लदे पुरुषों!
तुम्हें भी हक़ है सराहे जाने का:
खुद की तारीफ़ में कुछ लतीफ़े खोजना,
अपने सौंदर्य के कुछ रूपक गढ़ना,
कभी कभी अच्छी होती है आत्ममुग्धता भी...

अपने प्रेम में होना मन का सबसे पवित्रतम भाव है।



अपर्णा बाजपेयी

Wednesday, March 3, 2021

उसी मोड़ पर

 कभी उस मोड़ तक आना
तो ठहरना कुछ देर,
परछाइयां कुछ अब भी तेरी राह तक रही होंगीं,
जमीं पर डालना बस एक नज़र तुम यूं ही
शर्म में डूबी हुई आंखों का ख़याल आएगा,
हथेलियां अपनी भीचोगे तो उफ़्फ़ निकलेगी
किसी का हाँथ कट कर दूर गिरा हो जैसे,
 हवा उस मोड़ पर अब भी सुर्ख़ होगी कुछ
लालियां घुल गई थीं उनमे जो बरसों पहले,
पुराने दर्द बड़े कीमती होते हैं वहीं
जहां गिरने से कभी ज़ख्म लगा होता है..

अपर्णा बाजपेयी

Friday, February 26, 2021

बच्चे की बात (कविता)

आज मैंने आसमान में टंगी हुई इक रोटी देखी
चम-चम, चम-चम चमक रही थी,
रोटी पाना, क्या आसमान पाने जैसा है?
खाली मूली चांद देखकर क्या होता है
पेट नही भरता अपना है....
नींद हिलोरें देकर भी जाने कहाँ सरक गई है,
जब जब जलती बत्ती कोई दूर रोड पर,
मइया की धोती में थोड़ा और पसरते,
हो सकता बूंद एक दो बची हुई हों...
गोल-गोल रोटी के ऊपर रखी मलाई,
मिल जाएगी जिस दिन...
समझूंगा तुम सच में हो!
मंदिर भीतर मंद-मंद जो मुस्काते हो
हाँथ में पकड़े हुए हो जो बंशी तुम!
इधर उछालो तो जानूं
कि सच्चे हो तुम!

Picture credit google

अपर्णा बाजपेयी



Tuesday, February 23, 2021

अविवाहिता

 
गेसुओं में खिले गुलाब तरोताज़ा थे
 उन हांथों के स्पर्श से
भोर में जो रख देते थे माथे पर एक मीठा चुम्बन,
उसने नहीं देखा था सुबह का सूरज कभी,
 माँ के चरणों से छनती स्नेह-धूप
हजार सूरजों पर भारी थी...
चाय की कप के लिए मधुर पुकार ने
उसे इश्क़ के समंदर से खींच लिया था...
उम्र के ज्वर से कांपते शरीर
अम्बर में टंके चाँद से ज्यादा कीमती थे...
कुबूल है बोलने की जगह
कुबूला था उसने जन्मदाता के लिए नरम छांव बनना
उम्र की जमा पूंजी चन्द स्मृतियाँ थी;
जो मृत्यु की राह तक सहचर हुईं...

picture credit  @siddhant

अपर्णा बाजपेयी

Thursday, February 18, 2021

घमंडी पतंग (बाल कहानी)

 हमारा व्यवहार कैसा हो, यह जानने के लिए सुने और बच्चों को सुनाएं बाल कहानी- "घमंडी पतंग


कहानी पसंद आये तो like और share जरूर करें।

अपर्णा बाजपेयी


Sunday, February 14, 2021

'चल बिटिया स्कूल चलें हम '

आज प्रस्तुत है बच्चों के लिए लिखी गई विश्वमोहन कुमार की कविता 'चल बिटिया स्कूल चलें हम ' हमारे You Tube chanal Indradhanushi duniya पर....

आप भी हमारे साथ अपनी कहानियां, कविताएं शेयर कर सकते हैं


इसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचायें...

अपर्णा बाजपेयी

Saturday, January 30, 2021

असलियत का सामना( किस्सा बालों का)

फैशन करना किसे अच्छा नहीं लगता! खूबसूरत बाल, चमकदार आंखें,  उजली रंगत, खशबू उड़ाती अदा और न जाने क्या क्या...
तो दोस्तों मारे तो हम सब हैं फैशन के...

कभी कभी हम खुद को थोड़ा अलग दिखाना चाहते हैं... और इसके लिए भारी मशक्कत भी करते है. लेकिन क्या हो अगर भरे बाज़ार हमारा असली रूप सामने आ जाये।
तो किस्सा कुछ यूं है कि,

अरशद मियाँ क्या गबरू जवान हट्टे-कट्टे आदमी थे एक बार में चार आदमियों को धूल चटा देने वाले... मोहल्ले में उनके जैसा दिखने वाला दूसरा आदमी न था। घर में बूढ़े बाप के अलावा और कोई न था। बेचारे जल्द से जल्द शादी करना चाहते थे। खाला और फूफियों ने कई रिश्ते भी दिखाए थे पर बात बन न पाई थी। समस्या थी उनके बाल! जो दिनों दिन संख्या में कम होते जा रहे थे। अब टकला होना किसे अच्छा लगता है... बेचारे हर महीने हज़ारों रुपये अपने बालों को बचाने में खर्च करते। गूगल बाबा की शरण में जा-जा कर नए नए नुस्ख़े तलाशते और उन्हें अपने  बालों पर आजमाते, पर वही ढाक के तीन पात!! बालों का गिरना बदस्तूर जारी था।
एक दिन ख़ाला ने कहा कि एक खूबसूरत लड़की मिल गई है... जल्द से जल्द आकर देख लो नहीं तो वह भी हाँथ से निकल जायेगी। मियां मौका कैसे छोड़ते... पर बालों का क्या करें? समस्या जस की तस थी... आगे का सिर लगभग साफ़ ही चुका था और पीछे भी लगभल मैदान खाली ही था। हां दोनो कानों पर कुछ अम्पायर उंगली उठाये खड़े थे। अरशद मियां मन ही मन आउट हो ही चुके थे... 
मन की आस! कुछ तो करना ही था आख़िर कब तक कुंवारे बैठे रहते। हिम्मत करके एक नकली बालों वाली दुकान में पहुंचे। आह क्या खूबसूरत हसीनाएं अपनी जुल्फ़े लहराती हुई चारों तरफ़ घूम रही थी। तभी एक खूबसूरत आवाज़ ने उन्हें अपने पास और बुलाया और बोली, बताइये ज़नाब क्या ख़िदमत कर सकती हूँ आपकी और उसने एक झटका दिया अपने माथे पर आते बालों को... ख़ुशबू का तेज झोंका अरशद मियां को जैसे जन्नत तक उड़ा कर ले गया हो। चेहरे पर नज़र ऐसी गड़ी कि हटने का नाम नहीं ले रही थी।लडक़ी ने थोड़ी देर तो राह देखी कि मियां जमीन पर वापस आ जाएं लेकिन मियां जहां अटके थे लग रहा था कि गाजे-बाजे के साथ ही लौटेंगे। लडक़ी ने उनके कंधों को बुरी तरह से झिंझोड़ते हुए उन्हें जमीन पर ला पटका और बोली, आपको कुछ लेना है तो बोलिये नहीं तो सिक्योरिटी को बुलाऊँ! अरशद मियां हड़बड़ाकर बोले मोहतरमा," इस गंजे हो रहे सिर के लिए एक अदद विग की जरूरत है. अगर आप कुछ मदद कर सकें तो बड़ी मेहरबानी होगी'. जी मिस्टर क्यों नहीं आइये आप मेल सेक्सन की तरफ़ आइये।  मेल सेक्सन में पंहुचते ही अरशद किया को जैसे मुंह मागी मुराद मिल गई हो। ऐसे- ऐसे बाल कि नज़र न हटे। लाल, पीले, सुनहरे, काले, बरगंडी, भूरे , सफ़ेद अलग अलग रंगों वाले बेहतरीन कटिंग वाले बालों की ऐसी विग कि असली बाल भी उन्हें देखकर शरमा जाएं। कई सारी विग उन्होंने ट्राई की। खुद से ज्यादा उस लड़की की नज़र पर उन्हें भरोसा था। आख़िर विग लगाकर एक लड़की को देखने जो जाना था। अंत में मियां को काले और भूरे रंग के बालों वाली विग पसन्द आई जो वास्तव में  अमिताभ बच्चन के हेयर स्टाइल से मिलती जुलती थी।
मियां घर पहुंचे... बालों का मसला लगभग हल हो चुका था।
अगले दिन मौसी और अब्बा के साथ लड़की वालों के घर पहुंचे यह सोचकर कि सब कुछ ठीक ठीक रहा तो आज ही निकाह पढ़वा लेंगे। काज़ी भी साथ था। मियां ने लड़की को देखा और लड़की उन्हें पसंद आ गई थी। लड़की को भी वे पसंद थे । घर वालों ने जल्द से जल्द शादी का फैसला किया। लड़की जैसे ही उठी सबसे गले मिलने के लिए, मियां अरशद भी उठ खड़े हुए अब्बा और अन्य लोगों से मिलने के लिए,अचानक उनका सिर लड़की से टकरा गया और लड़की काजी के ऊपर धड़ाम से गिरी। इस हड़बड़ी में अरशद मियां की विग वहीं पर गिर गई ।अब विग तो गिरी और साथ में मियां के सारे अरमान भी वहीं ढेर हो गए। विग के साथ इज्जत भी गिर गई थी । सारे बाल नीचे आ चुके थे। फैशन और झूठ ने अपना रंग दिखा दिया था।
 लड़की वालों को बहुत समझाया बुझाया लेकिन लड़की वाले थे कि मानने को तैयार नहीं थे। पहले ही साफ़ बता देते कि सिर गंजा है... आखिर बाल ही तो गये थे.. झूठ बोलने और नकली बाल लगाने की क्या जरूरत थी!
झूठ ने रिश्ता तोड़ा, गंजा सिर लिए मियां अब नकली बालों का कारोबार कर रहे है ... उनका न सही किसी और का रिश्ता ही हो जाये शायद!



  




Wednesday, January 27, 2021

धागे का दु:ख


मजदूर के तन पर चढ़ा उतरन
खुशी में भूल जाता है अम्मा की उंगलियों का स्वाद,
करघा खड़ा है गांव के बाहर
कपास सिर धुन रही है मिल की तिजोरी में,
का से कहूं दुखवा मैं धागे का,
मिलान में रेड कार्पेट पर चलती हसीनाएं और उनका शरीर
न जाने आजकल गंध क्यों मारते हैं,
बाबू के माथे का पसीना
जब - जब गिरा है करघे की डोरों पर,
यह देश मेहनत की खुशबू में डूब गया है।

©️अपर्णा बाजपेई

Sunday, January 24, 2021

यह गणतंत्र दिवस हमारे कर्तव्यों के नाम


गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ आइए आज हम प्रण लेते हैं कि यह दिन हम अपने जीवन में मात्र एक छुट्टी के दिन की तरह न मनाकर याद करेंगे आज़ादी के उन लड़ाकों की कहानी जिन्होंने अपने आप को हंसते हंसते देश पर न्योछावर कर दिया था।

आज सबसे जरूरी है कि हम अपने बच्चों को इस आज़ादी की कीमत समझाएं, उन्हें बताएं इस प्रजातंत्र ने उन्हें क्या शक्ति दी है, हमारे संविधान ने उन्हें क्या अधिकार दिए हैं और उनके क्या कर्तव्य हैं।

आज जब पर्यावरण बिगड़ रहा है, जंगल सिकुड़ रहे है, इंसान मात्र एक संख्या भर है तब जरूरत है कि हम बच्चों को सही राह दिखाएं, उनके लिए प्रेरणा बनें।

इस गणतंत्र दिवस को प्रकृति और मानवता के नाम समर्पित करें।


Wednesday, January 20, 2021

झरबेरिया के बेर

 आज झरबेरिया का किस्सा सुनो दोस्तों!

तो हुआ यूं कि एक दिन राम खेलावन चच्चा बैठे रहे अपने दुआर पर। तब तक पियरिया अपनी झोरी में झड़बेरी के बेर लेकर खाते हुए निकली और राम खेलावन के दरवाज़े के बाहर गुठली थूक दी। राम खेलावन सब देख रहे थे। वहीं से चिल्लाए... ऐ पियारी एने आओ... उठाओ गुठली, दरवाज़े दरवाजे थूकती चलती है। पीयारी सहम गई... ई राम खेलावन चच्चा कहां से देख लिए.. अब हो गया सत्यानाश..

पियारी लौट के अाई का ,हुआ चच्चा... आवाज़ दिए थे का...

चच्चा का पारा सातवें आसमान पर..

देखो इसको.. दरवाजे पर गुठली थूक के कहती है आवाज़ दिए थे का.. ई गुठली उठाओ और भागो यहां से.. पियारी लजा गई। चच्चा आज नहीं छोड़ेंगे। दुवार पर गिरे एक- एक पत्ता को अपनी जेब में रखने वाले राम खेलावन आज दरवाजे पर किसी का थूक कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं। बात सही है चच्चा की। तब तक मोहल्ला के और लोग इकट्ठा हो गए।

 अपनी ही थूकी हुई गुठली उठाने में पियारी को बहुत शर्म अा रही थी वो भी सबके सामने। झट से चच्चा के सामने झोली फैलाते हुए बोली, चच्चा तनी खाके देखो ई बेर। हिया खटिया पर रख रहे हैं, अभी गुठली उठा के फेंक देंगे। तनी मिठास देखो बेर की। ऐसे झरबेरिया के बेर पूरे चौहद्दी में नहीं है । 

लाल, पीले, गुलाबी बेर देख के चच्चा की आंखों में जो चमक अाई की दुवार पर का थूक भूल गए। चच्चा ख़ाके के देखो, खाने के लिए पियारी जोर देने लगी। खट्ठे, मीठे बेर देख के किसका हांथ रुकता है। इकट्ठा भीड़ भी एक एक बेर उठाने लगी और चच्चा तो जैसे टूट पड़े। 

दुवार और गुठली सब भूल गए। पियारी मौका देख के  निकल ली। बोली, चच्चा  बेर खाइए हम अभी अा रहे हैं। वहां इकट्ठा भीड़ ने भी बेर खाए और गुठली वहीं थूकी। 

पियारी़ जा चुकी थी और बेर तोड़ने और राम खेलावन चच्चा झाड़ू लिए दुवार साफ कर रहे थे। 

 चच्चा सोच रहे थे सच में मति मार देते हैं ये झरबेरी के बेर...

अबकी आने दो पियारी को पूरा दुवार न साफ़ कराया तो कहना!

©️ अपर्णा बाजपेई

Image credit Google







Wednesday, January 13, 2021

नया कुछ रचना है

पानी में रहना है
मगर से लड़ना है
किस्सों की दुनिया में
नया कुछ रचना है।

होशियार से होशियारी की
लोहार से लोहे की
पेड़ों से लकड़ी की
शिकायत नहीं करते हैं।

आंखों से पानी को
भरे घर से नानी को
बैलों से सानी को
अलग नहीं करते हैं।

बातों में मिठास को
दावत में लिबास को
बीमारी में उपवास को 

दरकिनार नहीं करते हैं।।


©️ अपर्णा बाजपेई

Thursday, January 7, 2021

वक्त से उम्मीद कुछ ज्यादा रही थी

 वक्त से उम्मीद कुछ ज्यादा रही थी,
आज एक सरिता कहीं उल्टा बही थी
रुक गए थे हांथ में पतवार लेकर
मौज से कस्ती ने कुछ बातें कही थीं...


था अंधेरा हांथ में दीपक रखा था,
शाम ने जुगनू से एक मुक्त्तक कहा था,
धूप ने सींची थी वे कंपित गुफ़ाएं,
तम ने जिनमें मौन का संबल रखा था...

दोस्ती ने हांथ में खंजर रखा था,
पीठ पीछे शब्द ने गड्ढा बुना था
हांथ अपना कट चुका था बरसों पहले
देर से कितना कोई नश्तर चुभा था।

राह रोके खड़ी थीं कुछ वर्जनाएं
देहरी से दीप कुछ पीछे हटा था
लौटना था जिस तरफ हरदम अकेले
हांथ वहीं आकर सहसा कटा था

लौट आना फिर कभी कोई न बोला
ये जगह बस आपकी होकर रहेगी
स्वप्न सारे जीते होंगे जो कहानी
आज जाग्रत देह जिएगी दीवाली।।

©️Aparna Bajpai




जल है तो कल है

 सुनें एक कहानी और खोजें पानी बचाने के नए नए तरीके