आख़िरी इच्छा (लघुकथा)
दादा ने सुबह खटिया से उठते ही दादी से कहा, "कुछ मजेदार बनाओ आज ,खाकर दिल खुश हो जाए, बहुत दिन से उबला हुआ खाना खा कर लग रहा है जबान से स्वाद ही गायब हो गया है"। दादी ने दादा को घूर कर देखा, मानो कच्चा निगल जायेंगी। दादा ने नज़रें दूसरी तरफ़ फ़ेर लीं। उनकी इतनी हिम्मत कि दादी की नजरों का सामना कर सकें! "बुढ़ापे में चटोरी ज़बान पर काबू नहीं है। तेल मसाला खाते ही पाखाना दौड़ने लगते हैं, नारा बांधने की भी सुध नहीं रहती और खाएंगे मजेदार, स्वादिष्ट" बड़बड़ाते हुए दादी रसोई के डिब्बे खंगालने लगी। दादा घंटा भर से इंतज़ार कर रहे हैं कि अब बुलावा आए खाने का, लेकिन कहीं कोइ सुगबुगाहट नजर नहीँ आ रही। तब तक दादी थाली लेकर आती हुई दिखीं और धीरे से कमरे में जाकर दादा को इशारे से बुलाया। थाली देखकर दादा की आंखें चमकने लगी। पूरी, खीर, गोभी आलू मटर की सब्जी,बैंगन भाजा रसगुल्ला। दादी ने कहा ," पहले कमरा बंद करो, कोई देख न ले। फिर चुपचाप खा लो, और खबरदार जो थाली में एक निवाला भी छोड़ा।" दादा की नज़र थाली से नहीं हट रही, याद नहीं आ रहा कब ऐसे भोजन के दर्शन हुए थे। दादी ...
नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (02-08-2021 ) को भारत की बेटी पी.वी.सिंधु ने बैडमिंटन (महिला वर्ग ) में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा। (चर्चा अंक 4144) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। रात्रि 12:01 AM के बाद प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।
चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।
यदि हमारे द्वारा किए गए इस प्रयास से आपको कोई आपत्ति है तो कृपया संबंधित प्रस्तुति के अंक में अपनी टिप्पणी के ज़रिये या हमारे ब्लॉग पर प्रदर्शित संपर्क फ़ॉर्म के माध्यम से हमें सूचित कीजिएगा ताकि आपकी रचना का लिंक प्रस्तुति से विलोपित किया जा सके।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
#रवीन्द्र_सिंह_यादव
आदरणीय रवींद्र जी, हमारे इस प्रयास को मसनच पर स्थान देने के लिए सादर आभार
हटाएंअति सुन्दर बाल कथा ।
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया अमृता जी
हटाएंसादर
संवेदनाओं की सुंदर अभिव्यक्ति है इस कहानी में ।
जवाब देंहटाएंसुंदर बाल कहानी।
इस कहानी को अपना बहुमूल्य समय देने के लिए सादर आभार दी
हटाएंप्रिय अपर्णा कल सुनी थे ये बाल कथा | अच्छा लगा कि तुम बच्चों की रूचि को ध्यान मेंरखकर इतनी सुंदर कहानियाँ लिखती हो और मधुर वाचन से बच्चों तक सरलता से पहुँचाने का प्रयास भी करती हो | मोना के माध्यम से एक संवेदशील प्रेरक पात्र का सृजन हुआ है | बच्चे सुनेंगे तो जरुर मोना जैसे पशु प्रेमी बनना चाहेंगी | महावत का ह्रदय बदले वाली ये बालिका जरुर बच्चों के मन को छुएगी |
जवाब देंहटाएंप्रिय रेनू दी,
जवाब देंहटाएंआपकी टिप्पणी दिन बना देती है। बच्चों के कोमल मन में हम जैसे बीज रोपते हैं, बड़े होकर उनके हृदय से वैसी ही भावनाएँ प्रस्फुटित होती हैं। इंद्रधनुषी दुनिया के माध्यम से बच्चों के बीच कुछ मूल्यवान करने की कोशिश कर रहे हैं हम। आप सब अग्रजों का सहयोग और आशीर्वाद ही इस संघर्ष में हमारा संबल है।
सादर