नए साल में खुशियों का चश्मा
नया साल टकटकी लगाए झाँक रहा है कैलेण्डर से, जानता है महीने वही होंगे दिन भी.... बस उबासियों की हालत सुधर जायेगी. अम्मा का टूटा चश्मा शायद बदल जाए, बाबा की छड़ी की मूठ हो सकता है बना दी जाए नयी, गुड्डू को दिया जाय ताज़ा खाना शायद. अगले बरस, शायद कनस्तर में आंटा थोड़ा ज्यादा हो जाय. भूखे का पेट भर दिया जाय पूरा, पापा को चंद मिनट मिल जाएँ ज्यादा... अपने बच्चे की किलकारियां सुनने करने के लिए, नए साल में, सरहद पर खून के छींटे शायद कम गिरे, छोड़ दिए जांय बेक़सूर कैदी, सरकारी कार्यालयों में धूल फांकती फाइलें ले ही आयें घरों में उजास, न्याय की राह देखता मंगलू शायद पा ही जाए अपना हक़ .... नया बरस शायद खोज ही लाये सबकी खुशियों की चाभी! उम्मीद के बादल बरस रहे हैं मूसलाधार...... नए वर्ष में हवाओं का रुख बदल जाएगा या बदल जायेगा हमारा नज़रिया ही. (Picture credit google)