Monday, May 28, 2018

ये सरकारी कार्यालय है!


अजी ये भी कोई वक़्त है,
दिन के बारह ही तो बजे हैं,
अभी-अभी तो कार्यालय सजे हैं,
साहब घर से निकल गए है,
कार्यालय नहीं आये तो कंहा गए हैं,
ज़रा चाय-पानी लाओ,
गले को तर करवाओ,
सरकारी कार्यालय है,
भीड़ लगना आम है,
इतनी भी क्या जल्दी है
आराम से काम करना ही हेल्थी  है,
दौड़ भाग में काम करवाओगे,
मुझे भी मेडिकल लीव में भेजवाओगे,
आराम से बैठो,
आज नहीं तो कल काम हो ही जायेगा,
सूरज कभी न कभी निकल ही आयेगा,
सरकारी व्यवस्था में ऐसा ही होता है,
नौ की जगह काम एक बजे शुरू होता है,
सवाल करना बेकार है,
हमारा ही आदमी है,
हमारी ही व्यवस्था है,
जो कोई देखे सुने
वो गूंगा, बहरा अँधा है,
मुंह पर चुप रहने की सिलिप लगाओ,
व्यवस्था को कोसने से बाज आओ,
जंहा जाओगे यही हाल मिलेगा
कर्मचारी ग़ायब, शिकायतों का अंबार मिलेगा।

(Image credit google)


8 comments:

  1. नमस्ते,
    आपकी यह प्रस्तुति BLOG "पाँच लिंकों का आनंद"
    ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में
    गुरुवार 31 मई 2018 को प्रकाशनार्थ 1049 वें अंक में सम्मिलित की गयी है।

    प्रातः 4 बजे के उपरान्त प्रकाशित अंक अवलोकनार्थ उपलब्ध होगा।
    चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर।
    सधन्यवाद।

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  2. मेरी इस रचना को मंच पर स्थान देने के लिए सादर आभार आदरणीय रवीन्द्र जी।
    सादर

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  3. वाह!!!बहुत सुन्दर सटीक...
    सरकारी कार्यालय में यही तो चलता है बाहर तेज धूप में खड़े लोगों की भीड़ से उन्हें क्या लेना देना...
    लाजवाब कटाक्ष...

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  4. बेहतरीन प्रस्तुति ! बहुत खूब ।

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  5. प्रिय अपर्णा -- व्यंगात्मक शैली की ये रचना बहुत खूब लिखी आपने | सचमुच सरकारी तन्त्र ऐसा ही तो है हमेशा से -- कि अंधा बनते रेवड़ी और अपनों को दे ---सचमुच इस पर सवाल उठाना बेकार है | आपकी इस शैली की मैं प्रशंसक हूँ | हार्दिक शुभ कामनाएं |

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  6. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है https://rakeshkirachanay.blogspot.com/2018/06/72.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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  7. सरकारी कार्यालय के अधिकारियों से लेकर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों का यही हाल है और जनता बेहाल है। पत्रकार हूं, सो करीब ढ़ाई दशक से इसी पर लिखता आ रहा हूं, जब कभी कोई उर्जावान जिलाधिकारी आ जाता है, तो मातहत सावधान की मुद्रा में आ जाते हैं, नहीं तो वहीं अंधेरी रात है। बढ़िया चित्रण किया है आपने , साभार।

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भीतर कौंधती है बिजली, कांप जाता है तन अनायास, दिल की धड़कन लगाती है रेस, और रक्त....जम जाता है, डर बोलता नहीं कहता नहीं, नाचत...