Thursday, July 5, 2018

कविताओं की खेती

आँगन भर भर संजोती हूँ कवितायेँ,
उनके शब्दों में खेल लेती हूँ ताल-तलैया,
कभी कभी चाय के कप में उड़ेल कवितायेँ
चुस्कियां लेती हूँ उनके भावों की,
कवितायेँ भी... पीछा ही नहीं छोड़ती,
धमक पड़ती हैं कभी भी
मानती ही नहीं बिना लिखवाये,
कागज़ की नावों पर सैर कराती
मेघ की मल्हार पर कथक करवाती हैं,
तबले की थाप और बाँसुरी की धुन बनी,
पोर-पोर सरगम सी घुल घुल जाती हैं,
शब्दों के बगीचे में खड़ी मेरी कवितायेँ
अँखियों में लहू बन उतर-उतर जाती हैं,
कागज़ और कलम के बीच अनुभूतियां
कविता के बदन में निचुड़- निचुड़ जाती हैं,
बारिश के दिनों की रोचक अभिव्यक्तियाँ,
नज़्म और कविता बन महक महक जाती हैं,
सूखे से सावन और भीगे हुए भादों में
कवितायेँ ही मन का मीत बन जाती हैं,
उम्र की उल्टी गिनती शुरू होती है जबसे
कवितायें तन का संगीत बन जाती हैं,
चाहती हूँ..... बस यही शब्दों की खेती से;
खेतों खलिहानों में बीज बन उग जाएंगी,
आँगन में संजोयी हुई मेरी सारी कवितायेँ
हर भूखे पेट का चैन बन जाएंगी,
थके हारे नाविक के चरणों को छू कर के
कवितायेँ,उल्लास की देह बन जाएंगी।
#AparnaBajpai 





8 comments:

  1. वाह्ह्ह..बहुत सुंदर अभिव्यक्ति अपर्णा जी।
    कविताएँ पीछा कैसे छोड़ेगी भला...मन के भावों की स्याही से जब जीवन के पन्ने रंगते है तब कविताएँ बनती है।
    बहुत सुंंदर रचना👌👌

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  2. बहुत बहुत आभार श्वेता जी,तहेदिल शुक्रिया।
    सादर

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  3. सच कविता का अनंत रूप हैं, कब किस रूप में सामने आ जाय, कोई नहीं जानता
    बहुत खूब!

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  4. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक ९ जुलाई २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  5. प्रिय अपर्णा जी ,
    कविता के वृहद विशद रूप की महिमा के गुणगान ने आत्मा तृप्त कर दी ।अतीव सुन्दर ।
    सादर ।

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  6. सादर आभार पल्लवी जी आपका।अपना स्नेह बनाये रखें।

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  7. वाह!!अपर्णा जी ,बहुत सुंदर !!

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