Thursday, June 7, 2018

दहलीज़ पर कालिदास


कहो कालिदास,
आज दिन भर क्या किया,
धूप में खड़े खड़े पीले तो नहीं पड़े,
गंगा यमुना बहती रही स्वेद की
और तुम.... उफ़ भी  नहीं करते ,

कहो कालिदास,
कैसा लगा मालविका की नज़रों से विलग होकर,
तुम लौट-लौट कर आते रहे उसी दहलीज़ पर
मन में कौंधती रही दाड़िम दंतपंक्ति
मुस्कुराहटें संभालते रहे प्रेम की पोटली में
लौट नहीं पाते उसी द्वार
खुद से वादा..... प्रेम से ज्यादा जरूरी है?

कहो कालिदास,
विद्वता की गरिमा ओढ़
थके तो नहीं,
इससे तो अच्छा था कि
बैठे रहते उसी डाल पर
जिसे काट रहे थे,
गिरते तो गिरते, मरते तो मरते,
जो होना था हो जाता
महानता का बोझ तो न ढोना पड़ता,

अरे कालिदास!
महानता की दहलीज़ के बाहर आओ,
ज़रा मुस्कुराओ,
कुछ बेवकूफियां करो
कुछ नादानियाँ करो,
बौद्धिकता का खोल उतारो
हंसो खुल के
जियो खुल के,

अरे कालिदास!
एक बार तो जी लो अपनी ज़िंदगी।

(हर पुरुष के भीतर बैठे कालिदास को समर्पित)
(Image credit Shutterstock)

14 comments:

  1. जय हो,
    आधुनिक कालिदासों की...
    अच्छा व्यंग्य...
    सादर..

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    1. बहुत बहुत आभार भाई साहब
      सादर

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, सपने हैं ... सपनो का क्या - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. शुक्रिया शिवम जी,ब्लॉग बुलेटिन में रचना को शामिल करने के लिए।
      सादर

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  3. Replies
    1. शुक्रिया गिरिजा जी
      सादर

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  4. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक ११ जून २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  5. वाह!!बहुत खूब ।

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    1. शुभा दी , हार्दिक आभार।
      सादर

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  6. आज के कालिदास बस यूं ही मुस्कराते रह जाते हैं।

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  7. वाह ! प्रिय अपर्णा -- एक और विद्वतापूर्ण लेखन आपके नाम हो गया | सचमुच कोरे बोद्धिक वाद से उपजी नीरसता से इतर भी जीवन का महत्व है | उसे कालिदास के बहाने से खूब लिखा आपने | बहुर सुंदर उद्बोधन | !!!!!!! कालिदास भी मुस्कुराहट से भर गये होगें सुनकार | हार्दिक प्यार मेरा इस सुंदर रचना के लिए |

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    1. प्रिय रेनू दी, आप की प्रतिक्रिया मन को आह्लादित कर देती है। स्नेह जैसे दिल में सीधे उतर जाता है। मन की गहराइयों से आपको आभार प्रकट करती हूँ। बस आप का नेह हम यूं ही बरसता रहे यही ईश्वर से प्रार्थना है।
      सादर

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  8. अर्थपूर्ण लेखन ।पुरूष अपने दंभ को छोड़ स्वाभाविकता की सरसता का आनंद उठाने लगे तो उसका जीवन सरल हो जाएगा ।सुंदर व्यंग्यात्मक रचना अपर्णा जी,शुभकामनाएँ ।
    सादर ।

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