Monday, July 10, 2017

भरोसा है न !


आज मैं गुज़री थी तुहारी गलियों से
तुम्हारे  पदचिन्हों को बहुत ढूँढा पर मिले ही नहीं
क्या तुम अपने साथ लिए गए हो अपने प्रतीक भी।
कब्र के ऊपर घास उग आयी है,
कई पौधे उगे हैं लेकिन फूलों की आहट  मालूम नहीं होती ,
क्या तुमने काँटों से प्यार किया था ?
और उन्हें ही विरासत में दे दी थी ज़मीन  ...
घास बहुत कंटीली है लोग रौंदने के हिम्म्त नहीं कर पाते :
तुम्हे अपनी चीजों का ख्याल है और अपनी ताकत पर विष्वास भी:
याद रखो विश्वास टूटता भी है,
स्वार्थ का अंधड़ काफ़िला बन चुका है
और वंही से गुजरने वाला है जंहा से मै गुजरी  थी

तुम्हे मुझ पर भरोसा है न !








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