Saturday, July 15, 2017

परिंदे


दो परिंदे मेरी मुंडेर पर बैठे है
एक दूसरे के प्रेम में गुंथे हुए .....
दोनों साथ-साथ दाना लाये और खाने लगे .
एक दूसरे के स्पर्श से दूर कि उन्हें :
प्रेम का रिश्ता निभाने के लिए किसी अवलंब की आवश्यकता नहीं .
वे साथ है अपने अस्तित्व की तरह
कि उनका प्रेम साझा है ,
उनकी भूख साझी है ,

और उनकी उड़ान साझी है .

No comments:

Post a Comment

मंदिर में महिलाएं

अधजगी नींद सी कुछ बेचैन हैं तुम्हारी आंखें, आज काजल कुछ उदास है थकान सी पसरी है होंठों के बीच हंसी से दूर छिटक गई है खनक, आओ...