Thursday, April 12, 2018

विदा का नृत्य




मैं तुममें उतना ही देखता हूँ,
जितना बची हो तुम मुझमें,
किंवाड़ से लगकर भीतर झांकती तुम्हारी आँखें,
निकाल ले जाती हैं मुझे
पूरा का पूरा,
जीवन भर,
पुआल के ढेर पर सोता मैं,
सुस्ताता हूँ थोड़ी देर,
डनलप के गद्दों पर,
नींद आजकल सो रही है 
खेत के मेढ़ सी,
न इधर न उधर,
तराशता हूँ जब भी तुम्हारा बुत,
ख़्वाब में भी फूट जाते हैं,
तुम्हारी देह पर पड़े फ़फोले,
अपनी बुतपरस्ती देख,
रेशा-रेशा दहकता हूँ मैं,
भागता हूँ ख़ुद से दूर,
खो जाता हूँ किसी लोक धुन में,
नाचता हूँ सुखाड़ के गीतों पर भी,
अपने पैरों के जख़्मी होने तक,
अनंत यात्रा पर निकलता हूँ,
छोड़ जाता हूँ ये खलिहान,
कि...फसलें उगाने के दिन बीत गए हैं।
(Image credit google)

10 comments:

  1. आप अपने सिराहने पर
    दर्शनशास्त्र की किताब
    रखकर सो गई थी
    इसे पढ़कर ऐसा ही लग रहा है
    मर्म भी है इसमे
    सादर

    ReplyDelete
    Replies
    1. आदरणीय दी,
      सादर आभार

      Delete
  2. वाहह!सुंदर एहसास और शब्दावली👌

    ReplyDelete
  3. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  4. मैं तुममें उतना ही देखता हूँ,
    जितना बची हो तुम मुझमें,
    वाह! बहुत सार्थक!

    ReplyDelete
  5. वाह, बहुत खूबसूरत अहसास।

    ReplyDelete
  6. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है https://rakeshkirachanay.blogspot.in/2018/04/65_16.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

    ReplyDelete
  7. सुन्दर भावों से सजी रचना .

    ReplyDelete
  8. ऐसा कमाल का लिखा है आपने कि पढ़ते समय एक बार भी ले बाधित नहीं हुआ और भाव तो सीधे मन तक पहुंचे !!

    ReplyDelete

समलैंगिक प्रेम

बड़ा अजीब है प्रेम, किसी को भी हो जाता है, लड़की को लड़की से, लड़के को लड़के से भी, समलैंगिक प्रेम खड़ा है कटघरे में, अपराध है सभ्य समाज में...