अपनी - अपनी हकीक़त (लघु कथा)
उन्होंने अपने बच्चे को बुलाकर कहा, बेटा ज़रा इस बच्चे को रसोई से रोटी लाकर दो! बहुत भूखा है शायद.. बेटा उस बच्चे को देखता रहा और फ़िर उसे बुलाकर अपने घर के अंदर ले गया। बोला रोटी और सब्जी मैं निकाल रहा हूं, फ्रिज से पानी तुम निकाल लो। बच्चे ने फ्रिज खोला और उसे पानी के साथ कुछ फल भी दिख गए। उसने पानी निकाला और फ्रिज बंद कर दिया।
उनके बेटे ने उसके साथ - साथ अपने लिए भी खाना निकाला और साथ में बैठकर खाने लगा। तब तक वो अंदर आयीं , अपने बेटे को उस बच्चे के साथ खाते हुए देखकर उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पंहुच गया। तुझे इसे रोटी देने के लिए कहा था या साथ में बैठकर खिलाने के लिए। ए लड़के रोटी उठा और नि कल घर के बाहर....कहां कहां से आ जाते हैं..
सारी सहानुभूति एक मिनट में गायब!
उनका बेटा भी उसके साथ चल दिया... मानो दोनो दोस्त बहुत दिन बाद मिल रहे हों।
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अच्छा संदेश देती मार्मिक लघुकथा.
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शुक्रवार 10 जुलाई 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंमंच पर साझा करने के लिए शुक्रिया दी
हटाएंसादर
बड़ों की तरह सहानुभूति की भाषा बच्चों को नहीं समझ आती है उनको सिर्फ़ प्रेम समझ आता है।
जवाब देंहटाएंअच्छी लघुकथा।
बहुत आभार
हटाएंसादर
आभार सखी,
जवाब देंहटाएंसुधार दूँगी आज
बढ़िया अलक है
सादर..