Friday, October 20, 2017

मंहगाई में त्यौहार



चीनी मंहगी, गुड़ भी मंहगी
मंहगा दूध मिठाई है,
खील बताशे मंहगे हो गए
क्योँ दीवाली आयी है?

एक नहीं, दो नहीं, दस नहीं
खुशियों से है भरा बाज़ार,
कुछ लोगों की जेबें भरता
जाल बिछा है अपरम्पार.

खाली चूल्हा, जेबें खाली
अपने हिस्से आया शून्य,
सब चीजों का दाम बढ़ गया
मानव का बस घट गया मूल्य.

रेल टिकट का दाम बढ़ गया
भैया कैसे आऊँ मै?
रोली अक्षत मंहगे हो गए
कैसे प्यार लुटाऊँ मै?

लिखती हूँ कुछ शब्द नेह के
यही हमारा हैं त्यौहार,
कुछ पढ़ना कुछ जी लेना तुम
इन्हें समझ लेना उपहार.

(Image credit google)



8 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द" में सोमवार २३ अक्टूबर २०१७ को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.com आप सादर आमंत्रित हैं ,धन्यवाद! "एकलव्य"

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  2. वाह ! अपर्णा जी इकतरफ़ा दौड़ती भीड़ में भी अपनी आवाज़ बुलंद करने में माहिर हैं। इस पक्ष पर भी हमारी निगाह ठहरनी चाहिए। सुंदर रचना जोकि आक्रोश और कचोट का मिश्रण है। एक आवाज़ है जो ख़ुशी के शोर में अनसुनी हो गयी है।
    बधाई एवं शुभकामनाऐं।

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  3. भावपूर्ण कविता, सुंदर |

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  4. वाह!!बहुत सुंदर कविता !!

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    1. सुभा जी स्वागत है आपका. उत्साहवर्धन के लिये सादर आभार.

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  5. आप सभी का उत्साह्वर्धन के लिये सादर आभार.

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  6. बहुत खूब ... इस महंगाई में त्यौहार भी फीके हो जाते हैं ...

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भीतर कौंधती है बिजली, कांप जाता है तन अनायास, दिल की धड़कन लगाती है रेस, और रक्त....जम जाता है, डर बोलता नहीं कहता नहीं, नाचत...