झूठे बाज़ार में औरत
एक पूरा युग अपने भीतर जी रही है स्त्री, कहती है ख़ुद को नासमझ, उगाह नहीं पायी अब तक अपनी अस्मिता का मूल्य, मीडिया की बनाई छवि में घुट-घुट कर होंठ सी लेती है स्त्री, सड़कों पर कैंडल मार्च करती भीड़ में असली भेड़ियों को पहचान लेती है स्त्री चुप है, कि उसके नाम पर उगाहे जा रहे हैं प्रशस्ति पत्र, रुपयों की गठरियाँ सरकाई जा रही हैं गोदामों में, स्त्री विमर्श के नाम पर झूठ के पुलिंदों का अम्बार लग रहा है, लोग खुश हैं! कि रची जा रही है स्त्री की नई तस्वीर, खोजती हूँ कि इस तस्वीर से आम औरत ग़ायब है? (Image credit google)

जलवा दिया ना बेवा का घर
जवाब देंहटाएंकब से कर रहे हैं सचेत
लेकिन चेतने को कोई तैयार ही नहीं।
बेहतरीन रचना
शब्दों पर आप की पकड़ लाजवाब है। और सोने पे सुहागा उसके भाव। विषय चयन बेहद शानदार। अद्भुत !!!
जवाब देंहटाएंवाह!!बहुत खूब !
जवाब देंहटाएंसही कहा!
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है https://rakeshkirachanay.blogspot.in/2018/05/69.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंसादर आभार राकेश जी
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