Wednesday, September 26, 2018

प्रेम-राग

बड़ा पावन है
धरती और बारिश का रिश्ता,
झूम कर नाचती बारिश और
मह-मह महकती धरती;
बनती है सृष्टि का आधार,
उगते हैं बीज,
नए जीवन का आगाज़,
शाश्वत प्रेम का अनूठा उपहार,
बारिश और धरती का मधुर राग,
उन्मुक्त हवाओं में उड़ती,
सरस संगीत की धार,
तृप्त जन, मन, तन
तृप्त संसार.
#AparnaBajpai

6 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर रचना

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    1. शुक्रिया अभिलाषा जी
      सादर

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  2. बड़ा पावन है
    धरती और बारिश का रिश्ता,
    बहुत सुंदर पंक्तियाँ, काश ! मानव जीवन में भी रिश्तों में यही पावनता चहुंओर हो

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 27/09/2018 की बुलेटिन, धारा 377 के बाद धारा 497 की धार में बहता समाज : ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. प्रेम की बेहतरीन परिभाषा!

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