Friday, July 20, 2018

स्वाद!

उनकी टपकती खुशी में
छल की बारिश ज़्यादा है,
आँखों में रौशनी से ज्यादा है नमी,
धानी चूनरों में बंधे पड़े हैं कई प्रेम,
ऊब की काई पर तैरती है ज़िंदगी की फसल
गुमनाम इश्क़ की रवायत में,
जल रही हैं उंगलियां,
जल गया है कुछ चूल्हे की आग में,
आज खाने का स्वाद लज़ीज़ है।
©Aparna Bajpai
(Image credit alamy stock photo)

Saturday, July 7, 2018

एक सज़ायाफ्ता प्रेमी

प्रेम करते हुए
अचानक ही वो मूँद लेता है अपनी आँखें
और सिसकता है बेआवाज़,
हमारे प्रगाढ़ आलिंगन से दूर होता हुआ
नज़रें चुराता है,
बोलने की कोशिश में,
साथ नहीं देते होंठ,
बस लरज़ जाती है थोड़ी सी गर्दन,
मेरे प्रेम में आकंठ डूबा हुआ मेरा प्रेमी,
हार जाता है अपने आप से...कि
स्त्री के साथ रहना उसके लिए फांसी है
और स्त्री के बिना रहना मौत...
पुरुषत्व से बाहर आकर खुल जाता है उसका दर्द,
चरम तक पंहुचता हुआ उसका प्रेम,
दम तोड़ देता है बीच राह,
टूटी हुई चूड़ियों में अब भी लगे हैं ख़ून के धब्बे,
उजली चादर पर पसरा है लाल रंग,
प्रेम के संगीत में भरी हैं असंख्य चीखें,
वो उसके पहले प्रेम की आख़िरी चीख थी,
तब से गुमसुम है एक स्त्री उसके भीतर,
एक जीती जागती औरत का मृत जिस्म,
टंगा है उसकी अंतर्मन की दीवार पर,
वो ढो रहा है बलात्कृत स्त्री का दर्द,
और हर बार प्रेम में पड़ने के बाद,
जब भी छूता है किसी स्त्री का तन,
बीच राह भागना चाहता है अपने पुरुषत्व से,
आदिम गंध के बीच छला जाता है अपनी संवेदना से,
कि पुरुष पुरुष नहीं सज़ायाफ्ता है अब।।
#AparnaBajpai

(Image credit Shutterstock.com)




Thursday, July 5, 2018

कविताओं की खेती

आँगन भर भर संजोती हूँ कवितायेँ,
उनके शब्दों में खेल लेती हूँ ताल-तलैया,
कभी कभी चाय के कप में उड़ेल कवितायेँ
चुस्कियां लेती हूँ उनके भावों की,
कवितायेँ भी... पीछा ही नहीं छोड़ती,
धमक पड़ती हैं कभी भी
मानती ही नहीं बिना लिखवाये,
कागज़ की नावों पर सैर कराती
मेघ की मल्हार पर कथक करवाती हैं,
तबले की थाप और बाँसुरी की धुन बनी,
पोर-पोर सरगम सी घुल घुल जाती हैं,
शब्दों के बगीचे में खड़ी मेरी कवितायेँ
अँखियों में लहू बन उतर-उतर जाती हैं,
कागज़ और कलम के बीच अनुभूतियां
कविता के बदन में निचुड़- निचुड़ जाती हैं,
बारिश के दिनों की रोचक अभिव्यक्तियाँ,
नज़्म और कविता बन महक महक जाती हैं,
सूखे से सावन और भीगे हुए भादों में
कवितायेँ ही मन का मीत बन जाती हैं,
उम्र की उल्टी गिनती शुरू होती है जबसे
कवितायें तन का संगीत बन जाती हैं,
चाहती हूँ..... बस यही शब्दों की खेती से;
खेतों खलिहानों में बीज बन उग जाएंगी,
आँगन में संजोयी हुई मेरी सारी कवितायेँ
हर भूखे पेट का चैन बन जाएंगी,
थके हारे नाविक के चरणों को छू कर के
कवितायेँ,उल्लास की देह बन जाएंगी।
#AparnaBajpai 





सूखे मेघ


Tuesday, June 26, 2018

उम्र का नृत्य

उम्र चेहरे पर दिखाती है करतब,
उठ -उठ जाता है झुर्रियों का घूंघट,
बेहिसाब सपनों की लाश अब तैरती 
है आँखों की सतह पर,
कुछ झूठी उम्मीदें अब भी बैठी हैं,
आंखों के नीचे फूले हुए गुब्बारों पर,
याद आते हैं बचपन के दोस्त... 
जो पंहुच पाए किसी ऊंचे ओहदे पर 
कि... ऊपर आने के लिए बढ़ाया न हाँथ कभी,
कुछ दोस्त अब भी हाँथ थाम लेते हैं गाहे-बगाहे
जिनके हांथों में किस्मत की लकीरें न थी,
वक्त - जरूरत कुछ चांदी से चमकते बाल
खड़े हो जाते हैं हौंसला बन
जब चौंक जाता है करीब में सोया बच्चा नींद में ही,
पेट पर फिराता है हाँथ नन्हकू 
और हलक में उड़ेल लेता है 
एक लोटा पानी;
बटलोई में यूं ही घुमाती है चमचा पत्नी
और... पूछती है खाली आँखों से,
कुछ और लोगे क्या!!!!
उम्र की कहानी यूं चलती रहती है
वो भरते रहते हैं हुंकार
कि.... नींद न आ जाए वंहा
जंहा किस्मत खड़ी हो किसी मोड़ पर।
©Aparna Bajpai

(Image credit google)

Saturday, June 16, 2018

आँचल में सीप

तुम्हारी सीप सी आंखें
और ये अश्क के मोती,
बाख़बर हैं इश्क़ की रवायत से...
तलब थी एक अनछुए पल की
जानमाज बिछी;
ख़ुदा से वास्ता बना
तुम्हारी पलकों ने करवट ली
दुआ में हाँथ उठा 
बीज ने कुछ माँग लिया
मेघ बरसे, 
पत्तियों ने अंगड़ाई ली, 
धरती ने हरी साड़ी पहन, 
रेत से हाँथ मिलाया
बाँध लिए सीप मोतियों समेत
आँचल की गिरह में।

#AparnaBajpai



स्वाद!

उनकी टपकती खुशी में छल की बारिश ज़्यादा है, आँखों में रौशनी से ज्यादा है नमी, धानी चूनरों में बंधे पड़े हैं कई प्रेम, ऊब की काई पर...