Sunday, September 16, 2018

समलैंगिक प्रेम

बड़ा अजीब है प्रेम,
किसी को भी हो जाता है,
लड़की को लड़की से,
लड़के को लड़के से भी,
समलैंगिक प्रेम खड़ा है कटघरे में,
अपराध है सभ्य समाज में,
नथ और नाक के रिश्ते की तरह,
बड़ा गज़ब होता है,
एक होंठ पर दूसरे होंठ का बैठना,
बड़ी चतुर होती है जीभ दांतों के बीच,
कभी-कभी पांच की जगह छः उंगलियां भी
रोक नहीं पाती एशियाड में सोना मिलने से,
गोरी लड़की के काले मसूढ़े भी,
बन जाते हैं कुरूपता के मानक,
एक दांत पर दूसरे दांत का उग आना,
गाड़ देता है भाग्य के झंडे,
इस समाज में अजीब बातें  भी
हो जाती हैं स्वीकार,
फ़िर, समलैंगिक प्रेम!
क्यों रहा है बहिष्कृत?
क्यों है यह अपराध?
जिस समाज में प्रेम ही हो कटघरे में
वंहा समलैंगिकता पर बात!

हुजूर, आप की मति तो मारी नहीं गई,
विक्षिप्तता की ओर भागते दिमाग को रोकिये,
गंदी बातें कर पुरातन संस्कृति पर छिड़कते हो तेज़ाब,
ज़ुबान न जला दी जाए आपकी....
साफ़ सुथरी कविता लिखिए,
फूल ,पत्ती, चांद, धरती कितना कुछ तो है,
देखने सुनने को,
फ़िर...
अपनी मति पर कीचड़ मत पोतिये,
कुछ बातें सिर्फ़ किताबों के लिए छोड़िये,
प्रेम के अंधेरे गर्तों को मत उलीचिये,
रहने दीजिए अभिशप्त को अभिशप्त ही,
ज्यादा चूं-चपड़ में मुंह मत खोलिये।।

#AparnaBajpai

Saturday, August 25, 2018

भीड़ का ज़मीर

मैं इस बार मिलूँगी
भीड़ में निर्वस्त्र,
नींद जब भाग खड़ी होगी दूर
आँख बंद होने पर दिखेगी सिर्फ भीड़,
बाहें पसारते ही सिमट जायेगा तुम्हारा पौरुष,
तब, झांकना अपने भीतर
एक लौ जलती मिलेगी
वंही;
जंहा, जमा कर रखा है तुमने मुझे,
बरसों बरस.....
सूखी रेत पर झुलसते पैरों तले,
जब बुझा दिए गए थे सम्मान के दीप्त दिए,
जब सड़क पर भाग रही थी अकेली स्त्री, 
हजारों दानवों के बीच,
मैं मर गयी थी तुम्हारे भीतर;
एक लाश अटकी है तुम्हारी पुतलियों पर
उठाओ!!!
क्या तुम्हारे ज़मीर से ज्यादा भारी है,
सड़ी हुयी लाशें भारी हो जाती हैं,
और सड़ा हुआ जमीर....

भीड़ का कोई जमीर नहीं होता ।।
#Aparna Bajpai

Thursday, August 16, 2018

अटल जी की अवधी बोली में लिखी कविता

मनाली मत जइयो
मनाली मत जइयो, गोरी 
राजा के राज में

जइयो तो जइयो, 
उड़िके मत जइयो, 
अधर में लटकीहौ, 
वायुदूत के जहाज़ में.

जइयो तो जइयो, 
सन्देसा न पइयो, 
टेलिफोन बिगड़े हैं, 
मिर्धा महाराज में

जइयो तो जइयो, 
मशाल ले के जइयो, 
बिजुरी भइ बैरिन 
अंधेरिया रात में

जइयो तो जइयो, 
त्रिशूल बांध जइयो, 
मिलेंगे ख़ालिस्तानी, 
राजीव के राज में

मनाली तो जइहो. 
सुरग सुख पइहों. 
दुख नीको लागे, मोहे 
राजा के राज में।

Friday, August 3, 2018

बस एक ख़्वाब था छू ले कोई!


बस एक ख़्वाब था छू ले कोई ,
सहला दे ज़रा इन ज़ख्मों को
इक लम्हा अपना दे जाये और
बाँट ले मेरे अफ़सानों को।

कुछ नाज़ुक शब्द पिरोकर के
एक हार मुझे पहना जाएँ,
कुछ सच्ची -मुच्ची बातों से 
वो मेरा दिल बहला जाएँ।

कुछ सूरत ऐसी बन जाए
वो बैठे मेरे पहलू में,
मैं एक नदिया बन बह जाऊं 
वो एक समुन्दर हो जाएं।

कुछ रेत अभी भी बाक़ी है
कुछ किरचें आँखों में चुभतीं,
कुछ छाले दुखते हैं अब भी,
कुछ दर्द अभी भी रिसता है।

कुछ ख़्वाब अधूरे जाग रहे
कुछ उम्मीदें हैं राह तकती,
कुछ आस बची है आँखों में
कुछ बाकी हैं अलफ़ाज़ अभी।
#AparnaBajpai

(Image credit google)





Saturday, July 28, 2018

कारोबार




जब तुम अट्टालिकाओं की खेती कर रहे थे,
    तभी तुमने तबाह कर दिया था;
 बूढ़े बरगद का साम्राज्य,
पीपल की जमीन को रख दिया था गिरवीं,
न जाने कितने पेड़ों को किया था धराशायी,
अपनी रौ में ख़त्म कर रहे थे, 
अपने ही बच्चों की सांसें....
लो अब काटो अस्थमा की फसलें,
कैंसर के कारोबार से माल कमाओ,
दिल और गुर्दों का करो आयात- निर्यात,
तन का क्या है......
एक उजड़ेगा तो दूसरा मिलेगा
मृत्यु शाश्वत सत्य है
उससे क्या डर....
प्रकृति रहे न रहे,
धरती बचे न बचे, 
हमें क्या!
बरगद, पीपल , नीम के दिन नहीं रहे,
अब ईंटें उगाते हैं, लोहा खाते हैं
और अट्टालिकाओं के भीतर
जिन्दा दफ़न हो जाते हैं।।

#Aparna Bajpai
Image credit shutterstock
   



Friday, July 20, 2018

स्वाद!

उनकी टपकती खुशी में
छल की बारिश ज़्यादा है,
आँखों में रौशनी से ज्यादा है नमी,
धानी चूनरों में बंधे पड़े हैं कई प्रेम,
ऊब की काई पर तैरती है ज़िंदगी की फसल
गुमनाम इश्क़ की रवायत में,
जल रही हैं उंगलियां,
जल गया है कुछ चूल्हे की आग में,
आज खाने का स्वाद लज़ीज़ है।
©Aparna Bajpai
(Image credit alamy stock photo)

Saturday, July 7, 2018

एक सज़ायाफ्ता प्रेमी

प्रेम करते हुए
अचानक ही वो मूँद लेता है अपनी आँखें
और सिसकता है बेआवाज़,
हमारे प्रगाढ़ आलिंगन से दूर होता हुआ
नज़रें चुराता है,
बोलने की कोशिश में,
साथ नहीं देते होंठ,
बस लरज़ जाती है थोड़ी सी गर्दन,
मेरे प्रेम में आकंठ डूबा हुआ मेरा प्रेमी,
हार जाता है अपने आप से...कि
स्त्री के साथ रहना उसके लिए फांसी है
और स्त्री के बिना रहना मौत...
पुरुषत्व से बाहर आकर खुल जाता है उसका दर्द,
चरम तक पंहुचता हुआ उसका प्रेम,
दम तोड़ देता है बीच राह,
टूटी हुई चूड़ियों में अब भी लगे हैं ख़ून के धब्बे,
उजली चादर पर पसरा है लाल रंग,
प्रेम के संगीत में भरी हैं असंख्य चीखें,
वो उसके पहले प्रेम की आख़िरी चीख थी,
तब से गुमसुम है एक स्त्री उसके भीतर,
एक जीती जागती औरत का मृत जिस्म,
टंगा है उसकी अंतर्मन की दीवार पर,
वो ढो रहा है बलात्कृत स्त्री का दर्द,
और हर बार प्रेम में पड़ने के बाद,
जब भी छूता है किसी स्त्री का तन,
बीच राह भागना चाहता है अपने पुरुषत्व से,
आदिम गंध के बीच छला जाता है अपनी संवेदना से,
कि पुरुष पुरुष नहीं सज़ायाफ्ता है अब।।
#AparnaBajpai

(Image credit Shutterstock.com)




समलैंगिक प्रेम

बड़ा अजीब है प्रेम, किसी को भी हो जाता है, लड़की को लड़की से, लड़के को लड़के से भी, समलैंगिक प्रेम खड़ा है कटघरे में, अपराध है सभ्य समाज में...