Sunday, July 14, 2019

मर गई गइया, (लघुकथा)

  गइया ने इस बार फ़िर बछिया जन्मी थी, क्या करती कोख का पता नहीं रहता कि नर है या मादा। बछड़े की आस में बैठा रघु मरता क्या न करता, गुस्सा तो बहुत था क्या करे! बछिया मारे तो पाप न मारे तो हर नज़र करेजा में आग फुंक जाए...
चल आज तुझे ठिकाने लगाते हैं... शाम को ले गया टहलाने और कुएं में पानी दिखाने के बहाने बस एक धक्का... और गइया कुएं में...
बछिया की भी गर्दन मरोड़ फेंक आया मंदिर के पिछवाड़े... अब कलेजे में पड़ी थी ठंढक
उधर औरत की लाश तैर रही थी कुंए में और मंदिर के पिछवाड़े एक मरा बच्चा मिला था ...
पुलिस छानबीन कर रही थी और रघु साधू के भेष में घूम रहा था वृन्दावन की गलियों में...
गौशाला में डेरा डाले रवि गायों की सेवा से पाप धो रहा था और औरत को बेटी जन्माने की सज़ा मिली थी।

Image credit to Shutterstock


Friday, July 12, 2019

माटी की देह (लघु कथा)

फुगिया कुछ महीनों से बिस्तर पर है .... , उसका मर्द  दो को ला चुका है , रात काटी है उनके साथ और ठिकाने लगा आया है किसी बड़े शहर में.
जानती है सब कुछ फुगिया फिर भी चुप है.. पति नाम की तख्ती और जो टंगी है उसके सिर... भाग नहीं सकती अब.. कितने दिन और बचे हैं ज़िन्दगी के.. काम की नहीं रही अब।

फूल बेचती थी फुगिया कभी.. और फूलों के संग-संग गांव की कलियों को भी लगा देती थी ठौर- ठिकाने...
कोई भूखा न मरे गांव में.. और क्या बस इतना ही तो चाहती थी वो... बस नेकी कर और दरिया में डाल..
उसकी नेकी की खबर उस बार न जाने कैसे पुलिस को लग गई और बिना कोई देर हुए फुगिया जेल में थी... न किसी को खबर न पता! फुगिया गांव से गायब थी और खुद से भी.. मिर्ज़ा ने छुड़ाया था उसे और ले गया था कलकत्ता... दो तीन बार पहले भी मिली थी फुगिया उससे काम के सिलसिले में... बांग्लादेश, नेपाल से भी लाता था वो लड़कियों को और दिल्ली ले जाता था.. फुगिया भी मदद करती थी। दोनों ने शादी कर ली थी इस शर्त पर की कभी साथ में न सोएंगे.. आखिर मिर्ज़ा मुसलमान था और उसे कैसे मुंह लगा सकती है फुगिया... बड़े का मांस खाते हैं ये लोग बचपन से सुनती आई थी....
दोनों कमा रहे थे साथ-साथ.….लगा रहे थे ठौर ठिकाने लड़कियों को, बच्चों को और बूढ़ों को भी..
फिर वक्त का कुछ ऐसा धक्का लगा कि काम बंद हो गया...
मिर्ज़ा चला गया अपने देश और फुगिया बच गई.. कुछ दिन बचत से काम चलाया ...फिर कुछ न बचा तो देह काम आई...आखिर इस माटी की देह से क्या मोह...सांसे तो चलानी ही हैं... पांच बरस बीत गए यही सब करते हुए...
अब देह भी न बची...बिस्तर पर पड़ी है फुगिया ... उसका मर्द लौट आया है....काम धंधे में लगा है .... दो को ठौर- ठिकाने पंहुचा आया है किसी बड़े शहर में.
अब फुगिया की बारी... कहता है एक ही किडनी से काम चल सकता है तो दो रखने का क्या मतलब...
बात हो गई है किसी बड़े अस्पताल में..... इस माटी की देह से क्या मोह!!




Wednesday, November 28, 2018

खरीद -फ़रोख़्त (#Human trafficking)


बिकना मुश्किल नहीं
न ही बेचना,
मुश्किल है गायब हो जाना,
लुभावने वादों और पैसों की खनक
खींच लेती है
इंसान को बाज़ार में,
गांवो से गायब हो रही हैं बेटियां,
बेचे जा रहे हैं बच्चे,
आंखों से लुढ़कने वाले आँसू
रेत का दामन थाम
बस गए हैं आंखों में,
लौट आने की उम्मीद में,
गायब हो रही हैं पगडंडियां,
उदास हैं अम्मी और अब्बू!
न पैसे न औलाद,
कोई नहीं लौटता,
निगल लेती है मजबूरी,
गुम हो रही है पानी से तरंग
ख़ाली गांव, ख़ाली घर
सन्नाटे के सफ़र पर
चल निकला है आदमी.... कि
बाज़ार  निगल गया है रिश्तों की गर्माहट।

#AparnaBajpai

Wednesday, October 24, 2018

मंदिर में महिलाएं


अधजगी नींद सी
कुछ बेचैन हैं तुम्हारी आंखें,
आज काजल कुछ उदास है
थकान सी पसरी है होंठों के बीच
हंसी से दूर छिटक गई है खनक,
आओ न,
अपनी देह पर उभर आए ये बादल,
सृजन की शक्ति के सार्थक चिन्हों का स्वागत करो,
पांवों में दर्द की सिहरन को उतार दो
कुछ क्षण ,
राधे! आज मंदिर की शीतल सिला पर
सुकून की सांस लो,
सृष्टि की अनुगामिनी हो,
लाज का नहीं, गर्व का कारण है ये,
रजस्वला हो,
लोक-निर्माण की सहगामिनी!
मेरी सहचर!
स्त्री के रज से अपवित्र नही होता
 मैं, मंदिर और संसार
फ़िर.. ये डर..क्यों? 
कृष्ण ने राधा से कहा.
#AparnaBajpai

Tuesday, October 9, 2018

#me too

भीतर कौंधती है बिजली,
कांप जाता है तन अनायास,
दिल की धड़कन लगाती है रेस,
और रक्त....जम जाता है,
डर
बोलता नहीं
कहता नहीं,
नाचता है आंख की पुतलियों के साथ,
कंपकंपाते होंठ और थरथराता ज़िस्म,
लुढ़कता है आदिम सभ्यता की ओर,
तन पर कसे कपड़े
होते तार-तार
आत्मा चीखती है
घुट जाती आवाज़ भीतर ही,
 बच्ची... जैसे जन्म से होती है जवान,
वासना की लपलपाती जीभ
भस्म कर देती है सारे नैतिक आवरण,
आवाज़ तेज कर लड़की,
बाज़ार के ठेकेदार,
भूल रहे है तुम्हारी कीमत
डरना गुनाह है,
डराया जाएगा आजन्म,
पर हिम्मत भीतर ही है,
खोजो और खींच लाओ बाहर!
तुम्हारे सच पर भरोसा है,
तुम्हे भी, मुझे भी
मैं भी हूँ तुम्हारी आवाज़ में,
ऐ जांबाज़ हमसफ़र
भरोसा!!
#me too



Wednesday, October 3, 2018

उम्र का हिसाब

उस दिन कुछ धागे
बस यूं ही लपेट दिए बरगद में,
और जोड़ने लगी उम्र का हिसाब
उंगलियों पर पड़े निशान,
सच ही बोलते हैं,
एक पत्ता गिरा,
कह गया सच,
धागों से उम्र न बढ़ती है,
न घटती है,
उतर ही जाता है उम्र का उबाल एक दिन,
जमीन बुला लेती है अंततः
बैठाती है गोद,
थपकियों में आती है मौत की नींद,
छूट जाते हैं चंद निशान
धागों की शक्ल में.....
बरगद हरियाता है,
हर पतझड़ दे बाद,
जीवन भी......

Wednesday, September 26, 2018

प्रेम-राग

बड़ा पावन है
धरती और बारिश का रिश्ता,
झूम कर नाचती बारिश और
मह-मह महकती धरती;
बनती है सृष्टि का आधार,
उगते हैं बीज,
नए जीवन का आगाज़,
शाश्वत प्रेम का अनूठा उपहार,
बारिश और धरती का मधुर राग,
उन्मुक्त हवाओं में उड़ती,
सरस संगीत की धार,
तृप्त जन, मन, तन
तृप्त संसार.
#AparnaBajpai

मर गई गइया, (लघुकथा)

  गइया ने इस बार फ़िर बछिया जन्मी थी, क्या करती कोख का पता नहीं रहता कि नर है या मादा। बछड़े की आस में बैठा रघु मरता क्या न करता, गुस्सा ...