संदेश

रोटी का ख़त

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चूल्हे की रोटी ने संदेशा भेजा है, गए हुए लोगों ने याद किया भाफ़ को, रोटी के ख़त ने कहा है हवाओं से कि कह देना उनसे! चलें आएं वापस, बहार लौट चुकी है, वापसी के रास्तों पर नहीं जमी है अभी घास पावों को याद होगा अब भी पगडंडी पर अलसाई ओस का स्पर्श, लौटना कभी उतना मुश्किल नहीं होता जितना जाना, आत्मा को अपने सामान में समेटना, कितना तो कठिन होता है आंगन, देहरी, दीवारों से अपना हांथ छुड़ाना, लौटने के लिए हमेशा बची रहती है आस, पूछना उनसे जो छोड़ गए थे घर, खेत, माता पिता, यूं ही, रोटी रोज़गार, नून तेल सब की जुगत में.. इस बार लौटे तो खाली दालान ने कैसे की अगवानी, टूटे छप्पर ने लोरी गाई  कुंए के पानी ने ख़ाली पेट को तर किया या नहीं... कहना उनसे कि बांध लें असबाब, खेतों में मकई ने बांध दिया है समा, नन्हकू के छपरा पर फैला है कुम्हड़ा, अमरूद भर दे रहा है आंगन अपने बेटों से.. और इस बार आना वापसी का टिकट फाड़ कर फेंक देना रास्ते में गांव की बात गांव में , घर की बात घर में... अब सरकारी डायरियों में शहर की भीड़ छंट जाएगी। ©️ अपर्णा बाजपेई चित्र प्रभास कुमार की फेसबुक वाल से साभार

अस्तित्व

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  अच्छा हुआ कि आकाश हरा नहीं हुआ, धरती को लेने दी उसकी मन चाही रंगत, पेड़ों ने बर्फ के रंग न चुराए और बर्फ रही हमेशा अपने ही रंग में, अगर मिल जाता रंग धरती और आकाश का  तो क्या; धरती 'धरती' रहती! और आकाश बना रह पाता आकाश? ©️ अपर्णा बाजपेई चित्र  कवियत्री 'नताशा'  की फेसबुक वाल से साभार

खिड़की

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 कमरे की बंद खिड़की के पास, एक चुप चुपके से खिसक आती है, सीकचों से झांकती है घूंघट के भीतर का आकाश, हवा धीरे से छू लेती है उसकी अल्कों का दामन और चुप; चुपचाप ढक कर अपनी रूह के निशान, खिड़कियों के पीछे  छाप देती है अपनी हंथेलियों के अनकहे रंग। ©️ अपर्णा बाजपेई

शिक्षक जानता है

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 कक्षा की अंतिम कतार में  बैठता है अपने समय का सबसे प्रतिभाशाली छात्र, कॉपी के अंतिम पृष्ठ पर है रची जाती है उसकी बोरियत की रंगीन दुनिया, शिक्षक जानता है,  रंगा जा रहा है आज की शिक्षा का काला इतिहास; हर जीनियस बच्चे की कॉपी के अंतिम पृष्ठ पर, शिक्षक समझता है, उसके पाठ हो चुके हैं अर्थहीन, रोजी- रोजगार की संभावनाएं अब स्कूली किताबों के लिए दिवा स्वप्न है, शिक्षक जानता है वह मार रहा है  छात्रों की कल्पनाशीलता को रटाते हुए पुराने जवाब, मौन और मक्कारी के समय में शिक्षक  भर रहा है अपने बच्चों का पेट, विद्यालय में उपस्थिति का रजिस्टर  और मिड डे मील की थालियों की गणना शिक्षकों का प्रथम और अंतिम कर्तव्य है, ©️ अपर्णा बाजपेई

दृश्य

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1. दर्शकों ने इस बार तालियां नहीं बजाईं, न ही उतरे वो संवेदना के समुद्र में, दर्शक मंच पर थे, दृश्य में उतरे हुए, बलात्कारी के साथ... वासना का कथानक; पूरे थियेटर पर तारी था। 2. खिड़की के बाहर लटकी हैं दो आंखें, उमग कर करती हैं सलाम हवा के ताजे झोंके को, आंखें टिकी हैं ज़मीन पर  नाचते हुए पत्ते मृत्यु के जश्न में तल्लीन हैं। 3. चिता की आग पर उबल रहा पानी मृत्यु का आखिरी घूंट है, चाय की चुस्की विदा का अनन्य उपहार, जीवन और मृत्यु, चाय की परिधि में घूमते दो चक्र हैं। 4. पलाश के फूल और सुगनी के जूड़े का क्लिप  आदिवासी सभ्यता का स्थाई सौंदर्य हैं, जंगल दहकता है, उगलता है आग, हरियाणा के बाज़ार में; जूड़े का क्लिप; किसी की पैंट का  स्थाई बटन बनता है।। ©️Aparna Bajpai

कंधे

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ईश्वर उनके दरवाजे पर खड़ा था पीठ पर था हजारों मन्नतों का बोझ  पैर जकड़े थे मालाओं की डोरियों में,  आंख भर देखने के बाद ईश्वर ने ली संतोष की सांस, माड़ का कटोरा लिए हुए बच्चे नाच रहे थे मरणासन्न मां के आसपास, ईश्वर का काम ख़त्म हो चुका था... अब खुशियों का बोझ बच्चों के कंधों पर था.. ©️Aparna Bajpai

चिड़िया का इंतजाम

  उनके घर में एक चिड़िया है, रोज दाना लाती है। घर भर का पेट भरती है और परिवार के सब लोग निश्चिंत होकर सोते है। आज की रोटी और कल की दाल का इंतजाम चिड़िया के भरोसे है। सब कुछ सेट है। कहीं कोई दिक्कत नहीं।  वहीं पर एक और घर है, घर में दो लोग है मां और बेटी । मां घर के बाहर नहीं निकाल सकती और बेटी कमाती है । घर ठीक से चल जाता है और कोई चिंता नहीं। अचानक बेटी का काम एक्सीडेंट हो जाता है और उसका काम छूट जाता है।  घर  में अब दाना लाने वाली कोई चिड़िया नहीं।   समस्या जटिल है। चिड़िया का इंतजाम कैसे हो । दाना कौन लाए? बेटी का विवाह हो और उसका पति जिम्मेदारी उठाए।  बेटी का विवाह नहीं हो पाता, दूल्हा कौन खोजे, इंतजाम कौन करे? सामाजिक रूप से उनका कोई पालनहार नहीं। अब क्या हो? क्या वे दोनो आत्महत्या कर लें जो कि पड़ोसी चाहते हैं, ताकि उनका घर हड़पा जा सके. मां 60वर्ष से ज्यादा की है और बेटी 40 के आसपास। उम्र साथ छोड़ रही है.... समाज भी... संकट गहरा है और हितैषी न के बराबर। अब रसोई के सारे कनस्तर खाली हैं और भरने वाला कोई नहीं... कोई कुछ करेगा क्या????