Friday, January 12, 2018

मुक्ति!


प्रेम की कश्ती समन्दर ले चला है
और ममता खोजती है छाँव अपनी
अश्क सारे बन रहे अवलंब अपने
दास्तां किसको सुनाये मोह बंधन.

है अगर ये प्रीति सच्ची देह की
तो तुम्हे हम रोक लेंगे मार्ग में ही
हाथ थामे रूह से चलकर मिलेंगे
और उसको सौंप देंगे प्रीति अपनी.

लो संभालो नेह के बंधन रसीले
हम हुए अब मुक्त इस स्थूल जग से
ले चलो गन्तव्य तक अब साथ दो तुम
थक गया हूँ मैं बहुत अब थम लो तुम.

जग है मिथ्या, तन है मिथ्या और मिथ्या रीतियाँ सब
सिर्फ सच्ची रूह है और उसकी खूबियाँ सब
एक डगर जाती वंहा है सब है राही उस डगर के
एक मंजिल , एक मकसद, एक ही रब है सभी के 
छोड़ दो ये आपाधापी , उसकी डोरी थम लो अब 
तोड़ कर सब अर्थ बंधन मुक्त हो कर सांस लो अब.  

(image credit google)




12 comments:

  1. सादर आभार आदरणीय विश्वमोहन जी!
    ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहती है.
    सादर

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  2. सुन्दर ,बहुत सुन्दर....
    वाह!!!

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  3. जग है मिथ्या, तन है मिथ्या और मिथ्या रीतियाँ सब
    सिर्फ सच्ची रूह है और उसकी खूबियाँ सब....
    सुंदर सारगर्भित रचना हेतु बधाई आदरणीय अपर्णा जी।

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  4. लो संभालो नेह के बंधन रसीले
    हम हुए अब मुक्त इस स्थूल जग से
    ले चलो गन्तव्य तक अब साथ दो तुम
    थक गया हूँ मैं बहुत अब थाम लो तुम....ा
    मुक्ति की आशा लिए मन की यह पुकार, यह क्रन्दन है या है मन के वेदना की चित्कार, ये मन किसको रहा तू पुकार, मुक्ति पाएगा तू तब सुन पाएगा वो निर्विकार....

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  5. आध्यात्मिक विचारों से प्रेरित बहुत मन को छूती रचना ।
    बहुत नफासत से परोसा गया सात्विक भोजन।
    बधाई सुंदर रचनाके लिये।
    शुभ दिवस।

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  6. Prem rasila hai to katila bhi hai
    Dhahne ko ye ret ka tila bhi hai..
    Tham lo nabz iski gungunate raho
    Khush ro Lohri-Sankranti manate raho

    Chaay wala prem sada tha ye sade se kuchh zyada likha hai. Ek baar fir mere man ko bahut bha gayi apki rachna.

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  7. बहुत ही सुन्दर रचना...

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  8. आपकी लिखी रचना आज "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 16 जनवरी 2018 को साझा की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  9. मुक्त होके सभी बंधनों से प्रेम का बंधन ख़ुद से जोड़ता है ...
    इस बंधन से जुड़ के सभी कुछ मुक्त हो जाता है ... बहुत सुंदर रचना

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दूर हूँ....कि पास हूँ

मैं बार-बार मुस्कुरा उठता हूँ  तुम्हारे होंठो के बीच, बेवज़ह निकल जाता हूँ तुम्हारी आह में, जब भी उठाती हो कलम लिख जाता हूँ तुम...