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Thursday, January 4, 2018

नदी बहती रहे!


बहती हुयी नदी 
अपने साथ लाती है संस्कृतियों की बाड़, 
न जाने कितने संस्कारों की साक्ष्य बनती है,
जीवन के हर कर्म के साथ साथ रहती है 
प्रेम में पगे जोड़ों के ख़ूबसूरत एहसास 
बहे चले आते हैं नदी के साथ......... कि 
बस जाती है पूरी की पूरी सभ्यता...
विकसित होती हैं परम्पराएं,
नदी के पेट में सिर्फ पानी ही नहीं होता,
दफ़्न  होते हैं न जाने कितने राज़ भी........ 
पहाड़ी साँझ का सूर्य भी बहा चला आता है,
मैदानों के बाजारों में काम की तलाश करता है
खोजता है जीवन की उम्मीद .....कि
ज़िंदगी बहती रहे नदी के साथ.
बड़ी -बड़ी चट्टानें पानी के साथ बहते हुए;
भूल जाती हैं अपना शिलापन,
हजारों मील के सफर में 
गायब हो जाता है उनका नुकीलापन
छोटे-छोटे चिकने पत्थर बन  
नन्हे हांथों के खिलौने हो जाती हैं,
नदी ही धार.... 
कभी काटती है, उखाड़ती है 
तो कभी बसाती है.... 
भूख में ,प्यास में ,सृष्टि के विकास में 
नदी ही सहारा है,
बची रहेगी नदी तो बची रहेंगी सभ्यताएं,
नालों में तब्दील होती नदियाँ 
दे रहीं दरख्वास्त!
ज़िंदा रखो हमें भी 
अपने साथ -साथ।।

(picture credit google)



  

7 comments:

  1. बहुत सुन्दर 👏👏👏💐

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’सोशल मीडिया पर हम सब हैं अनजाने जासूस : ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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    1. आदरणीय राजा जी, मेरी रचना को शामिल करने के लिये आभार.
      सादर

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  3. बहुत ख़ूब नदी बची रही तो बची रहेंगी सभ्यताएँ ...
    सही कहा है बिलकुल ...

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